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काशी की जंग, तरह-तरह के रंग

Sat, 10 May 2014 11:16 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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तीन लोकों से न्यारी काशी...। सचमुच इन दिनों यहां की छटा निराली ही है। वजह भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की मौजूदगी हो या और कोई। काशी की चुनावी जंग में तरह-तरह के रंग दिख रहे हैं।
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भाजपाई रंग वाली तरह-तरह की साड़ियां, डिजाइनर कुर्ते-पायजामे, शर्ट-पैंट पहनाकर कपड़ों की दुकानों के बाहर रखे डमी चुनावी मौसम का अनायास ही एहसास करा देते हैं।

होटलों में विभिन्न राज्यों के प्रचलित खान-पान की चीजें मेन्यू में शामिल कर ली गई हैं तो घरों में मेहमानों के डेरे खासा रंग बिखेर रहे हैं। पर, इन सबमें सबसे टॉप पर है टोपियों का रंग और इनकी जंग।
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कहीं मुखौटे, तो कहीं टोपियां

संस्कृति और साहित्य का केंद्र काशी, संगीत के मामले में बहुत खास स्थान रखती है। पर, इन दिनों परदेसियों के जमावड़े से काशी को लघु भारत कहे जाने का अर्थ सार्थक हो रहा है।

शहर की सभी सड़कें देश के बहु संस्कृतिधर्मी होने का संदेश दे रही हैं। बनारस के कई प्रसिद्ध अखाड़े भले ही अपनी रौनक खोते जा रहे हों लेकिन काशी की सड़कें इन दिनों सियासी अखाड़ों का रंग दिखा रही हैं।

हालांकि कहीं टोपियों का रंग जमाने के चक्कर में जंग हो रही है तो कहीं एक ही मोटर साइकिल पर तीन रंग की टोपियां इस शहर में बाबा भोलेनाथ के प्रभाव का परचम फहराती दिख रही हैं।

बनारस की सड़कों पर इन दिनों सुबह से लेकर देर रात तक जगह-जगह मोदी के मुखौटे पहने लोग और झाड़ू लिए हाथ एक-दूसरे को चुनौती देते दिख जाते हैं।

टोपियों की जंग से भांप रहे नब्ज

भले ही तमाम राजनीतिक विश्लेषक काशी की जंग में मोदी को जीता हुआ मान रहे हों लेकिन टोपी वालों की संख्या पर यहां के सियासी सरोकार तलाशे जाएं तो इस नगरी में ऑटो रिक्शा चालक बृजमोहन जैसे तमाम लोग ऐसे मिल जाएंगे जो तपाक से कह देते हैं, ‘ केजरीवाल मोदी को कड़ी टक्कर दे रहे हैं।’

गुरुवार को ‘आप’ के कार्यकर्ता काशी की सड़कों पर जगह-जगह जिस हौसले से नारेबाजी करते नजर आए, उसे लेकर अंदरखाने भाजपा भी परेशान दिखी।

मोदी के जुलूस में भारी भीड़ होने के बावजूद भाजपा के केंद्रीय चुनाव कार्यालय में कई लोग केजरीवाल की चर्चा में ही डूबे दिखे। कोई कह रहा था, ‘केजरीवाल के कार्यकर्ता घर-घर पहुंच रहे हैं।

हम लोग इस मामले में पीछे हैं। किसी को इस बात की चिंता थी कि कहीं जीत का अंतर तीन लाख से घट न जाए। किसी की जुबान पर यह था कि जीतेंगे हम लेकिन केजरीवाल का नाम हर जुबान पर पहुंच जाना भी उनकी जीत से कम नहीं है।’

परदेसियों का डेरा

देशी-विदेशी पर्यटकों और पढ़ाई के लिए आने वालों के कारण पहचानी जाने वाली काशी में इन दिनों परदेसियों के काफी पड़ाव पड़े हुए हैं।

बीएस सेठी झारखंड से आए हैं तो महेश्वर बंगलूरू से अपने 20 साथियों के साथ 10 दिन से काशी में हैं। बीएस स्वामी अपने साथियों के साथ तमिलनाडु के छोटे से गांव से आए हैं।

ऐसे ही अन्य तमाम लोग इन दिनों अपना घर-बार और कामकाज छोड़ मोदी के लिए काशी में डटे हैं। केजरीवाल के खेमे में भी कम परदेसी नहीं हैं।

कोई युवक आगरा से बीटेक कर रहा है तो कोई बुजुर्ग मुरादाबाद के कठघर से केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में शामिल होने आया है।

बीटेक कर चुके मुकुल दिल्ली से आए हैं। बताते हैं, ‘यहां अपने नाते-रिश्तेदारों के बीच जाकर केजरीवाल के लिए वोट मांगता हूं। व्यवस्था की गंदगी साफ करने के लिए केजरीवाल वाली झाड़ू जरूरी है।’
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अपनी-अपनी टोपी, अपना-अपना राग

हाल यह है कि आप या भाजपा में किसी भी एक पार्टी के कार्यकर्ता जैसे ही किसी चौराहे पर नारे लगाने शुरू करते हैं, पता नहीं कहां से खबर पाकर चंद मिनट में दूसरी पार्टी वाले भी अपनी टोपी लगाकर उनके मुकाबले आ डटते हैं।

अक्सर यह मामले दिल्लगी तक ही सीमित रहते हैं तो कभी दिल पर ले लेने से रंग में भंग भी हो जाता है। जैसे बृहस्पतिवार को हुआ।

लंका से थोड़ा आगे बढ़ने पर एक मोड़ के पास भाजपा व आप के लोग आमने-सामने नारेबाजी कर रहे थे।

इसी बीच आप की तरफ का एक युवक भाजपा वालों की तरफ आया और एक युवक को हंसते हुए खींच ले गया और उसके सिर ‘आप’ की टोपी लगा दी। जवाब में भाजपा की तरफ से ऐसा ही किया गया।

पर,‘टोपियां बदलने’ के बावजूद जब दोनों अपनी-अपनी पार्टियों के ही नारे लगाते रहे तो दोनों तरफ तालियों ने चुनावी प्रचार के बनारसी रंग को और गाढ़ा कर दिया।
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