निर्णय अच्छा, असर खराब
सपा सरकार में किसानों को पांच ट्रॉली मिट्टी बिना किसी अनुमति के उपयोग में लेने की अनुमति थी। मुख्यमंत्री योगी ने इसे 10 ट्रॉली कर दिया, मगर खनन विभाग ने मिट्टी निकालने के लिए बीडीओ, एसडीएम व डीएम की अनुमति लेनी जरूरी कर दी। इससे किसानों की परेशानी बढ़ी। उनका शोषण भी हुआ।
योगी सरकार ने स्लॉटर हाउस पर पाबंदी के साथ ही आवारा पशुओं की समस्या का संज्ञान लिया। गौसेवा आयोग का गठन किया। इसे गौवंश के संरक्षण व आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए स्थायी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई, मगर आयोग ने क्या किया, शायद ही किसी को पता हो? किसान फसल बचाने के लिए परिवार के सदस्यों की बारी-बारी से ड्यूटी लगाने को मजबूर हो गए। किसानों की कर्जमाफी जैसा बड़ा फैसला भी इस समस्या के समाधान में सुस्ती पर भारी पड़ा।
एंटी भू-माफिया अभियान का गरीबों पर कहर
सरकार ने एंटी भू-माफिया अभियान चलाया, लेकिन फीडबैक उल्टा आया। पता चला कि मंडल व जिलों के अफसर गरीबों के उत्पीड़न पर उतर आए। जिनके पास रहने को ठौर नहीं, उन्हें उजाड़ कर कार्रवाई की खानापूर्ति की जाने लगी। गरीबों का उत्पीड़न न हो, इसके लिए मुख्य सचिव को आदेश जारी करना पड़ा। इसके बावजूद बदलाव नहीं आया।
‘जन-सुनवाई’ पोर्टल पर आम लोगों को अपनी शिकायत करने का मौका दिया गया। मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ने अफसरों को हिदायत दी कि जिस कर्मी या अफसर की शिकायत हो, शिकायत की जांच उसे कदापि न दी जाए। कम से कम उससे एक स्तर ऊपर के अफसर को जांच दी जाए।
इसके बावजूद इस सिस्टम पर आने वाली शिकायतों पर मनमानी, झूठी, परस्पर विरोधी रिपोर्ट लगाई जा रही है। शिकायत से जुड़े कर्मी से ही जांच कराई जा रही है। गलत रिपोर्ट देने वालों को न पकड़ने और उनके खिलाफ कार्रवाई न होने से लोगों में सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ी है।
बेलगाम अफसरों पर कार्रवाई में सुस्ती
चुनिंदा दागी व बेलगाम अफसरों के खिलाफ कार्रवाई में सुस्ती से भी लोगों में गलत संदेश गया है। मसलन, गोरखपुर और कानपुर देहात के डीएम रामपुर में खनन को लेकर चर्चा में रहे हैं। हाईकोर्ट ने इनकी भूमिका पर तल्ख टिप्पणी कर कार्रवाई के निर्देश दिए।
मगर, दोनों अफसरों को कलेक्टर जैसे अहम पद पर बनाए रखा गया। बरेली के डीएम और अमेठी के एसडीएम ने फेसबुक पर कटाक्ष किया, लेकिन किरकिरी के सबब बने ये अफसर हटाए तक नहीं गए।
सचिवालय में 10 हजार से ज्यादा अफसर-कर्मचारी कार्यरत हैं। सचिवालय सहकारी बैंक के प्रबंधन ने जमकर लूट मचाई। इसकी जांच हुई तो मनमानी, गबन, वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि हुई। बैंक के सचिव सेवा से बाहर कर दिए गए। तत्कालीन सभापति की जिम्मेदारी तय की गई। वसूली का आदेश हुआ। बैंक की बर्बादी के कारनामों में प्रबंधतंत्र की भूमिका चर्चा का विषय बनती रही, मगर सचिव के अलावा किसी के खिलाफ कुछ नहीं हुआ।
भर्तियों में सुस्ती से युवाओं में बेचैनी
सरकार से शिक्षामित्रों की नाराजगी किसी से छुपी नहीं है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव में इसकी काट में बीएड व टीईटी उत्तीर्ण बेरोजगारों को सत्ता में आने पर अवसर दिलाने की बात की थी। एक लाख से अधिक बीएड व टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थी बेरोजगार घूम रहे हैं।
इनकी मांग है कि राज्य सरकार, केंद्र व एनसीटीई से विशेष अनुमति लेकर उन्हें भी प्राइमरी शिक्षकों की भर्ती की प्रतिस्पर्धा में मौका दे, लेकिन इनकी सुनवाई नहीं हो रही। इसके अलावा चयन आयोगों के गठन में देरी ने भी युवाओं को खाली बैठने को मजबूर किया। इन युवाओं की नाराजगी साफ नजर आ रही है।