इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हाईकोर्ट प्रशासन से कहा है कि वह अगली बार से उप्र उच्चतर न्यायिक सेवा (यूपीएचजेएस) परीक्षा का प्रश्नपत्र हिंदी में भी उपलब्ध करवाने पर विचार करे। इस संबंध में दायर याचिका में कहा गया था कि जब इस परीक्षा में सवालों के जवाब हिंदी व इंग्लिश दोनों में देने की छूट है तो प्रश्नपत्र केवल इंग्लिश में क्यों आता है।
याचिका का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रश्नपत्र हिंदी में भी तैयार किए जा सकते हैं। याचिकाकर्ता बीरेंद्र सिंह खुद वकील हैं और 31 जुलाई को होने जा रही यूपीएचजेएस परीक्षा 2016 में उम्मीदवार हैं। याचिका में उन्होंने कहा कि परीक्षा में देवनागरी लिपि में जवाब लिखने का विकल्प दिया जाता है, लेकिन हाईकोर्ट हिंदी में प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने में विफल रहा है।
प्रश्नपत्र हिंदी और इंग्लिश दोनों में होने चाहिए। ऐसा नहीं किया जाता है तो यह संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन होगा। इस पर हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से अधिवक्ता उपेंद्रनाथ मिश्रा ने कहा कि याचिकाकर्ता बीरेंद्र सिंह का बतौर वकील अनुभव उनके अंग्रेजी में कमजोर होने की ओर इशारा नहीं करता है।
वे अंग्रेजी में पूछे गए सवालों का जवाब दे सकते हैं। दूसरी ओर अब तक किसी भी परीक्षार्थी ने इसको लेकर समस्या नहीं बताई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यों में एचजेएस भर्ती परीक्षा तय समय पर कराने के लिए दिए निर्देशों को भी अदालत के समक्ष रखा।
याचिका का निस्तारण करते हुए जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस राघवेंद्र कुमार ने कहा कि निचली अदालतों की भाषा आधिकारिक रूप से हिंदी की गई है। वहीं इस बात में भी कोई शक नहीं है कि उत्तर प्रदेश में हिंदी सर्वमान्य है।
यूपीएचजेएस का प्रश्नपत्र सामान्य ज्ञान और विधि के प्रश्नों के जवाब हिंदी में देने का विकल्प देता है। ऐसे में प्रश्नपत्र हिंदी में न होने की कोई वजह नहीं मिलती।
अनुवाद संभव नहीं तो सुझाया विकल्प
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हाईकोर्ट के वकील ने कहा कि कानूनी शब्दावली में उपयुक्त शब्दों, खासतौर से जिनमें निर्णय इंग्लिश में दिए गए हैं और बहुत दफा विदेशी कानूनों और निर्णयों का भी हवाला दिया गया है, उन्हें स्पष्ट अभिव्यक्ति की जरूरत होती है।
वे इंग्लिश में तो स्पष्ट हैं लेकिन हिंदी में उनका उपयुक्त अनुवाद संभव नहीं है। ऐसे में याचिका खारिज कर दी जानी चाहिए। इस पर खंडपीठ ने कहा कि सवाल तैयार करना विशेषज्ञता का काम है। प्रदेश में कानून की पढ़ाई इंग्लिश और हिंदी दोनों में करवाई जा रही है।
ऐसे में यह माना नहीं जा सकता कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों, विदेशी अदालतों में इंग्लिश में हुए निर्णय आदि को उत्तर प्रदेश में नहीं पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में किसी भी कानूनी विषय पर हिंदी में सवाल बनाए जा सकते हैं। अगर कोई वाक्यांश या शब्द उसी मूल रूप में बेहतर समझाया जा सकता है तो उसे रोमन में लिखा जा सकता है। इस तरह कोई कन्फ्यूजन नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने फैसले में कहा
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खंडपीठ ने निर्णय में कहा कि याचिकाकर्ता के तर्क को खारिज नहीं किया जा सकता। इस मामले को हाईकोर्ट के प्रशासन को ही देखना है, ऐसे में वे भविष्य में होने वाली यूपीएचजेएस परीक्षाओं में हिंदी में प्रश्नपत्र बनाने के लिए उचित निर्णय लें।
मौजूदा परीक्षा में बहुत समय नहीं बचा है, इसलिए इसके विषय में यह निर्णय नहीं दिया जा रहा है। मौजूदा परीक्षा की पूरी प्रक्रिया हो जाने के बाद हाईकोर्ट भविष्य की परीक्षाओं में केवल इंग्लिश में बन रहे प्रश्नपत्र का विवाद खत्म कर सकता है।
वर्ष 2007 में इसी विषय पर राकेश कुमार शर्मा की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर याचिका को नकारते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय अंग्रेजी में होते हैं, एचजेएस काडर के सदस्य को सिविल जजों के ऊपर अपीलीय न्यायालय में काम करना होगा, हाईकोर्ट के भी अधिकतर निर्णय इंग्लिश में होते हैं।
ऐसे में अगर किसी व्यक्ति को अच्छी इंगिलश नहीं आती तो वह संवैधानिक प्रावधानों और अदालतों के अंग्रेजी में हुए कामकाज को कैसे समझ पाएगा? अगर व्यक्ति अंग्रेजी में योग्य नहीं है और अंग्रेजी में सवाल नहीं समझ पा रहा है तो वह एचजेएस में चयन के लिए फिट नहीं है।
2007 के इस निर्णय पर ताजा फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राकेश शर्मा की ओर से हिंदी में प्रश्नपत्र की मांग को इस रूप में नहीं लिया जाना चाहिए कि वे एचजेएस में चयन और नियुक्ति के लिए फिट नहीं हैं। इस तरह के कथन से सहमत नहीं हुआ जा सकता।