वर्ष 2019 के दिसंबर महीने में सीएए-एनआरसी के खिलाफ लखनऊ समेत प्रदेश के कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए। पुलिस की पड़ताल में कई जिलों में पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के सदस्यों की संलिप्तता सामने आई। इसके बाद पुलिस ने पीएफआई के खिलाफ प्रदेशव्यापी अभियान छेड़ दिया।
पीएफआई की गतिविधियों को देखते हुए यूपी के तत्कालीन डीजीपी ओम प्रकाश सिंह ने एक प्रस्ताव तैयार कराया, जो पीएफआई व उससे जुड़ी तमाम संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने का था। शासन ने यह प्रस्ताव केंद्र को भेज दिया था। यूपी के बाद कर्नाटक व गुजरात सरकार ने भी पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश केंद्र को भेजी। इसके बाद अब केंद्र सरकार ने पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया है।
यूपी में पीएफआई की सक्रियता वर्ष 2010 से समय-समय पर सामने आती रहीं लेकिन सीएए-एनआरसी प्रदर्शन के दौरान पहली बार इस संगठन का हिंसक रूप सामने आया था। इसके बाद सितंबर 2020 में हाथरस में एक युवती की दुष्कर्म के बाद हत्या की घटना के बाद जिले में कानून-व्यवस्था की चुनौती खड़ी हो गई थी। इसी मामले में गिरफ्तार पीएफआई से जुड़ा एक पत्रकार सिद्दीक कप्पन और उसका साथी रऊफ लखनऊ जेल में बंद है।
हाथरस कांड में पीएफआई की भूमिका की पड़ताल एसटीएफ को अहम जानकारी हाथ लगी। इसके बाद 16 फरवरी 2021 को बसंत पंचमी से ठीक पहले प्रदेश को सीरियल ब्लास्ट के जरिए दहलाने की योजना बना रहे पीएफआई के दो सदस्यों को यूपी एसटीएफ ने लखनऊ के गुडंबा क्षेत्र से गिरफ्तार कर उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया था। लखनऊ से गिरफ्तार केरल निवासी अशद बदरुद्दीन और फिरोज खान ने प्रदेश के प्रमुख स्थानों पर धमाके की सिफारिश रची थी।