गोरखपुर सीट पर भाजपा प्रत्याशी न होने से पार्टी को लेकर मतदाताओं का रुख साफ नहीं हो सका। पार्टी स्नातक क्षेत्र की एक और प्रतिष्ठापूर्ण इलाहाबाद-झांसी सीट भी नहीं बचा पाई। इस सीट पर भाजपा ने चार बार के एमएलसी डॉ. यज्ञदत्त शर्मा को प्रत्याशी बनाया था। सपा ने यह सीट भी भाजपा से छीन ली। इन सीटों की हार ने भाजपा की जीत के उल्लास को कसैला बना दिया है।
इन चुनावों में शिक्षक व स्नातक मतदाताओं का मिजाज भी सामने आया है। माना जाता है कि आम चुनावों में यह वर्ग वोटरों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है। इस वर्ग का संदेश साफ है कि चुनाव जीतकर दूरी बना लेने वाले नेता अब उसे स्वीकार नहीं हैं। ऐसे लोगों की जगह वे किसी भी प्रत्याशी के रूप में नए चेहरे को मौका दे सकते हैं। उसके बीच रहकर काम करने वाले पुराने सदस्यों को फिर मौका देने में भी उसे कोई परहेज नहीं है। मतदाताओं ने 9 नए चेहरों को ताज पहना दिया तो दो मौजूदा सदस्यों ध्रुव कुमार त्रिपाठी और उमेश द्विवेदी को मौका देने में संकोच नहीं किया।
सपा ने इस चुनाव में शिक्षक व स्नातक की सभी 11 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। सपा ने न सिर्फ वाराणसी की शिक्षक व स्नातक कोटे की दोनों सीटें जीतीं, बल्कि इलाहाबाद-झांसी सीट भी भाजपा से झटक ली। 11 में दो सीटें सपा के पास थीं लेकिन उसने एक और सीट पर कब्जा जमाकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया। कांग्रेस कहीं लड़ाई में भी नहीं दिखी।