26 मार्च को भर्ती हुई रीता का 27 मार्च को ऑपरेशन हुआ।शुरुआती दिनों में रीता की स्थिति सामान्य थी, मगर ऑपरेशन के बाद स्थिति सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती चली गई। डॉक्टरों ने हर बार परिजनों को तसल्ली दी, सब ठीक हो जाएगा, नींद की दवा दी है, थोड़ा और समय लगेगा, लेकिन रीता की हालत नहीं सुधरी।
जमीन बेचकर जुटाया इलाज का खर्च, फिर भी नहीं बची बहू
बिना सहमति के जबरन डिस्चार्ज, और रास्ते में छूटा साथ
राम मिलन ने बताया कि बृहस्पतिवार को मरीज के साथ सिर्फ वही अस्पताल में थे। बेटा और अन्य परिजन रुपयों के इंतजाम के लिए घर गए थे। तभी अस्पताल वालों ने दबाव बनाकर जबरन कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए और गंभीर हालत में रीता को अस्पताल से बाहर कर दिया। वह घर तक नहीं पहुंच सकी, रास्ते में ही मौत हो गई।
थाने में दी तहरीर, मांगा इंसाफ
सीएमओ डॉ. एनबी सिंह के अनुसार रीता की मौत से दुखी परिजनों ने अस्पताल प्रशासन के रवैये से नाराजगी जताई है। देर रात उन्होंने विभूतिखंड थाने में अस्पताल प्रशासन के खिलाफ तहरीर भी दी है। उनकी एक ही मांग है-इंसाफ। मामले की जांच कराई जाएगी। जांच में आरोप सही मिले तो कार्रवाई की संस्तुति होगी।
जांच रिपोर्ट आने के बाद की जाएगी कार्रवाई
इंस्पेक्टर कुमार सिंह के बताया कि परिजनों ने मैकवेल हॉस्पिटल पर आरोप लगाते हुए तहरीर दी है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीएमओ को पत्र भेजा गया है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं मैकवेल हॉस्पिटल के मैनेजर सौरभ सिंह का कहना है कि तीमारदारों का आरोप गलत है। वह अपनी मर्जी से मरीज को लेकर गए थे। उन्होंने डेढ़ लाख रुपये बिल का भुगतान भी नहीं किया।