लोकसभा चुनाव में कांग्रेस छह सीटों पर जीत गई है, जबकि 11 पर दूसरे स्थान पर है। पार्टी ने रायबरेली में अपना दबदबा बरकरार रखा तो अमेठी में पांच साल बाद हिसाब बराबर कर लिया। वहीं प्रयागराज, सहारनपुर में 40 साल बाद परचम लहराने में कामयाब रही। जिन सीटों पर कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही वहां 2019 की अपेक्षा 40 फीसदी वोटबैंक बढ़ा है।
इसकी बड़ी वजह यह है कि कांग्रेस और सपा की एकजुटता मंच से लेकर बूथ तक कायम रही। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस वर्ष 2014 में 7.53 फीसदी और 2019 में 6.36 फीसदी वोट हासिल कर पाई थी, लेकिन वर्ष 2024 में वह 9.46 फीसदी पर पहुंच गई है।
पेश है सीटों का विवरण बयां करती रिपोर्ट :
रायबरेली- यहां गांधी परिवार का दबदबा कायम है। सोनिया गांधी के बाद उनके बेटे राहुल गांधी विजयी रहे। यहां वर्ष 2019 में सोनिया गांधी को 55.80 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 2024 में राहुल गांधी को 66.17 फीसदी वोट मिले। भाजपा 38.36 से घटकर 28.64 फीसदी पर आ गई।
अमेठी- यह सीट भी इस चुनाव में कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा ने स्मृति ईरानी से जीत ली। कांग्रेस को वर्ष 2019 की अपेक्षा 11.03 फीसदी की बढ़त के साथ 54.99 फीसदी वोट मिले, जबकि स्मृति ईरानी को 11.70 फीसदी की गिरावट के साथ 37.94 फीसदी वोट मिले।
सीतापुर- यहां 35 साल बाद कांग्रेस काबिज हुई है। कभी भाजपा के विधायक रहे राकेश राठौर इस बार कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे और विजयी रहे। यहां कांग्रेस को वर्ष 2019 की अपेक्षा 39.18 फीसदी की बढ़त मिली है, जबकि भाजपा के वोटबैंक में 8.27 फीसदी की गिरावट हुई है।
बाराबंकी- यहां से वर्ष 2009 में पीएल पुनिया सांसद चुने गए। इस बार उनके बेटे तनुज पुनिया विजयी रहे। वे वर्ष 2019 की अपेक्षा 41.96 फीसदी वोटबैंक बढ़ाकर 55.78 फीसदी वोट हासिल किए। जबकि भाजपा की राजरानी रावत 7.32 फीसदी की गिरावट के साथ 39.07 फीसदी वोट हासिल कर पाईं।
प्रयागराज- यहां वर्ष 1984 में कांग्रेस के टिकट पर अमिताभ बच्चन चुने गए थे। करीब 40 साल बाद सपा से कांग्रेस में आए उज्जवल रणन सिंह ने कांग्रेस का परचम लहराया है। उन्होंने 2019 की अपेक्षा 45 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 48.80 फीसदी वोटबैंक हासिल किया।
सहारनपुर- यहां भी 40 साल बाद इमरान मसूद ने कांग्रेस का परचम लहराया है। वे 2019 की अपेक्षा 27.76 फीसदी बढ़त के साथ 44.57 फीसदी वोटबैंक हासिल किए, जबकि भाजपा 0.59 फीसदी की गिरावट के साथ 39.33 फीसदी वोटबैंक हासिल कर पाई।
यहां वोट प्रतिशत बढ़ाने में मिली सफलता
वाराणसी - वर्ष 2009 में कांग्रेस से सांसद बने राजेशपति मिश्रा अब भाजपा में हैं। कांग्रेस के अजय राय 26.36 फीसदी की बढ़त के साथ 40.74 फीसदी वोटबैंक हासिल किए। जबकि भाजपा 9.38 फीसदी की गिरावट के साथ 54.24 फीसदी पर रही।
झांसी- यहां 2009 में प्रदीप जैन ने परचम लहराया। उसके बाद कांग्रेस को सफलता नहीं मिली। 2019 की अपेक्षा 36.33 फीसदी की बढ़त के साथ कांग्रेस को 42.57 फीसदी वोट मिला, जबकि भाजपा को 8.61 फीसदी की गिरावट के साथ 50 फीसदी वोट मिला।
बांसगांव- यहां 2004 के बाद कांग्रेस को सफलता नहीं मिला है। 2019 की अपेक्षा कांग्रेस के सदल प्रसाद 5.53 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 45.04 फीसदी वोट हासिल किए। भाजपा 11.03 फीसदी की गिरावट के साथ 45.38 फीसदी वोट हासिल कर सकी।
देवरिया- यहां करीब 40 साल से कांग्रेस को सफलता नहीं मिली है। 2019 की अपेक्षा कांग्रेस के अखिलेश सिंह को 40 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 45.02 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 8.81 फीसदी की गिरावट के साथ 48.38 फीसदी वोट मिला।
महराजगंज- यहां 2009 के बाद कांग्रेस खाली हाथ है। इस चुनाव में वर्ष 2019 की अपेक्षा 40 फीसदी बढ़त के साथ वीरेंद्र चौधरी को 45.92 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 10.35 फीसदी की गिरावट के साथ 48.85 फीसदी वोट मिले।
गाजियाबाद- इस सीट के बनने के बाद से ही भाजपा का कब्जा है। यहां 2019 की अपेक्षा कांग्रेस की डॉली शर्मा को 27 फीसदी की बढ़त के साथ 35.17 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 3.93 फीसदी की गिरावट के साथ 58.09 फीसदी वोट मिले।
बुलंदशहर- यहां भी 40 साल से कांग्रेस को कामयाबी नहीं मिली है। वर्ष 2019 की अपेक्षा कांग्रेस को 27.94 फीसदी की बढ़त के साथ 30.56 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को चार फीसदी की गिरावट के साथ 56.65 फीसदी वोट मिले।
मथुरा- वर्ष 2004 के बाद कांग्रेस मैदान से बाहर है। वर्ष 2019 की अपेक्षा इस बार कांग्रेस के मुकेश धनगर को 20 फीसदी की बढ़त के साथ 22.64 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा की हेमा मालिनी को 7.84 फीसदी की गिरावट के साथ 53.03 फीसदी वोट मिले।
फतेहपुर सीकरी- यहां भी 40 साल से कांग्रेस का खाता नहीं खुला है। वर्ष 2019 की अपेक्षा कांग्रेस के रामनाथ सिकरवार को 22.31 फीसदी की बढ़त के साथ 38.90 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा के राजकुमार को 21.23 फीसदी की गिरावट के साथ 43.09 फीसदी वोट मिले।
अमरोहा- यहां 1998 के बाद कांग्रेस का खाता नहीं खुला है। इस बार कांग्रेस के दानिश अली को 40.32 फीसदी वोट मिले। जबकि बसपा के टिकट पर वर्ष 2019 में उन्हें 51.41 फीसदी वोट मिले थे। तब कांग्रेस को सिर्फ 1.07 फीसदी वोट मिले थे। भाजपा को पिछली बार की अपेक्षा तीन फीसदी की गिरावट के साथ 42.90 फीसदी पर रही।
कानपुर- यहां 2009 के बाद से कांग्रेस को सफलता नहीं मिली है। 2019 की अपेक्षा कांग्रेस उम्मीदवार आलोक मिश्रा को 10.43 फीसदी की बढ़त के साथ 47.56 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 5.70 फीसदी की गिरावट के साथ 49.93 फीसदी वोट मिले।