चुनावी बॉन्ड का मुद्दा लोकसभा चुनाव में लहलहाती फसल नहीं बन पाया है। राजनीतिक दल भी जान गए हैं कि यह मुद्दा वोट में तब्दील नहीं हो पाएगा। उद्योग और कारोबारी संगठनों के प्रतिनिधि इसके सवाल पर चुटकी ले रहे हैं।
इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए करीब 12 हजार करोड़ से अधिक के चुनावी चंदे को लेकर भले ही हो-हल्ला मचा हो, लेकिन चुनावी जमीन पर इस मुद्दे की फसल ज्यादा लहलहाती नहीं दिख रही है। यह मुद्दा राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप तक सिमट कर रह गया है।
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यही वजह है कि चुनावी सीजन में बॉन्ड को ‘गरमागरम छौंक’ के रूप में देख रहे राजनीतिक दल भी जान गए हैं कि यह मुद्दा वोट में तब्दील नहीं हो पाएगा। चुनावी बॉन्ड के जरिए 1300 संस्थाओं ने 12,000 करोड़ रुपये से अधिक के बॉन्ड खरीदे।
इन बॉन्डों को 23 राजनीतिक दलों को दिया गया। इसे लेकर बहस छिड़ी है। पर, यह मुद्दा बनते नहीं दिख रहा है, जैसा कि राजनीतिक दल मान रहे थे। उद्योग और कारोबारी संगठनों के प्रतिनिधि इसके सवाल पर चुटकी लेते हुए कहते हैं...और भी गम हैं जमाने में चुनावी बॉन्ड के सिवा।
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बहस तक ही अच्छा है बॉन्ड का मुद्दा
कारोबारियों का साफ कहना है कि इसमें नई बात क्या है। एक बड़े कॉरपोरेट घराने के सीईओ कहते हैं, चंदा देने की परंपरा कोई नई थोड़े ही है। मेरे परदादा भी चंदा देते थे। पहले कैश देते थे। बॉन्ड आने के बाद बैंक के जरिये दिए गए। इसमें गलत क्या किया।
हां, ये जरूर है कि घाटे वाली कंपनियां कैसे भारी भरकम चंदा दे रही हैं। संदिग्ध लोगों के चंदों की जांच होनी चाहिए। समाजशास्त्री डॉ. एम पी सिंह के मुताबिक चुनावी बॉन्ड बात और वाद-विवाद तक तो अच्छा लगता है, लेकिन जमीन पर आते ही बोरिंग हो जाता है।
पहले चेक से दिया जाता था चंदा
चुनावी बॉन्ड से पहले राजनीतिक पार्टियों को चेक से चंदा दिया जाता था। चंदे में दी गई राशि की पूरी जानकारी उनके सालाना खाते में होती थी।
राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग को चंदा देने वाले का नाम और मिली राशि की जानकारी देती थीं। बड़े चंदे इस रास्ते से नहीं मिलते थे, क्योंकि इसकी पूरी जानकारी आयोग को देनी होती थी। 40 साल पहले सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता रसीद लेकर घर-घर चंदा लेते थे। वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच राजनीतिक दलों को कुल मिले चंदे में से करीब 70 फीसदी का स्रोत अज्ञात था।
जानिए, कैसे जारी होता है
राजनीतिक दल जिसने पिछली लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम-से-कम एक फीसदी वोट हासिल किया हो, वह इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये चंदा ले सकता है। इस प्रावधान के जरिये उन चंदों पर रोक लगाने की मंशा है, जो उन दलों को दिए जाते हैं जो चुनाव में हिस्सा नहीं लेते। इलेक्टोरल बॉन्ड किसी भी वित्त वर्ष की एक तिमाही में केवल 10 दिनों के लिए जारी किए जाते हैं। लोकसभा चुनाव के साल में 30 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाता है।
एसबीआई की कुछ चुनिंदा शाखाओं से जारी होने वाले चुनावी बॉन्ड की वैधता, जारी करने के 15 दिनों तक रहती है। चंदा देने वाले को इन्हीं 15 दिनों के दौरान अपने पसंदीदा राजनीतिक दल के खाते में बॉन्ड को कैश कराना होता है। ये बॉन्ड कम से कम एक हजार और अधिकतम एक करोड़ रुपये के हो सकते हैं। चुनावी बॉन्ड के खरीदार को सभी केवाईसी नियमों को पूरा करना होता है, ताकि अवैध खाते से इन बॉन्डों की खरीद न हो सके।
कमियां दूर की जाएं
राजनीतिक दलों को चंदा देने का चलन 1952 से ही चला आ रहा है। हमेशा से जो पार्टी सत्ता में रही है, सबसे ज्यादा चंदा उसी को मिलता है। पहली बार चंदे को पारदर्शी बनाने की शुरुआत की गई। जो कमियां हैं, उसे दूर करने पर काम होना चाहिए। -मनुराज सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता, इलाहाबाद हाईकोर्ट
सत्ता कभी भी किसी के हाथ में आ सकती है। इसलिए किस दल को कितना चंदा दे रहे हैं, यह बताना व्यवसायी के लिए बहुत मुश्किल होता है। चुनाव में ये मुद्दा आम लोगों पर असर नहीं डालेगा क्योंकि सभी को पता है कि राजनीतिक दल व्यापारियों और उद्योगपतियों के सहयोग से ही चलते हैं। -सीए अभिषेक पांडेय, सदस्य, सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल