अभिलेखों में भी इसे वक्फ कब्रिस्तान दर्ज कर दिया गया
सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण के सामने पेश रिकॉर्ड में वक्फ निरीक्षक की सर्वे रिपोर्ट भी अहम साबित हुई। इसमें साफ कहा गया था कि गाटा संख्या 31 कब्रिस्तान नहीं बल्कि काश्त की भूमि है, जबकि कब्रिस्तान दूसरे गाटा नंबर में स्थित है। इसके बावजूद वक्फ सूची में गाटा संख्या 31 को कब्रिस्तान के रूप में शामिल कर लिया गया। बाद में इसी आधार पर चकबंदी और राजस्व अभिलेखों में भी इसे वक्फ कब्रिस्तान दर्ज कर दिया गया।
उपजिलाधिकारी और चकबंदी अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में भी मौके पर खेती होने की बात सामने आई। कमीशन रिपोर्ट में विवादित भूमि पर फसल और यूकेलिप्टिस के पेड़ होने का उल्लेख है, जबकि किसी कच्ची या पक्की कब्र का उल्लेख नहीं मिला।
न्यायाधिकरण ने कही ये बात
न्यायाधिकरण ने कहा कि केवल वक्फ सूची में दर्ज होने के आधार पर भूमि को वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब सर्वे और अन्य अभिलेख स्वयं उसकी प्रकृति कृषि भूमि बताते हों। पीठ ने माना कि गाटा संख्या 31 को उसकी वास्तविक प्रकृति के विपरीत कब्रिस्तान के रूप में दर्ज किया गया।
उप्र वक्फ न्यायाधिकरण अध्यक्ष प्रहलाद सिंह और सदस्यों राम सुरेश वर्मा व ओम प्रकाश की पीठ ने उभय पक्षों को सुनने व अभिलेखों के परीक्षण के उपरांत वक्फ बोर्ड और संबंधित राजस्व अधिकारियों को एक माह के भीतर वक्फ कब्रिस्तान की प्रविष्टि निरस्त कर वादीगण का नाम दर्ज करने की कार्रवाई पूरी करने का आदेश दिया है।