फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

UP: यहां फर्जी एनकाउंटर पर मिलता है इनाम

Wed, 24 Sep 2014 10:58 AM IST
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
उत्तर प्रदेश में तो फर्जी एनकाउंटर कर पुलिस वाले अपनी वर्दी पर अतिरिक्त सितारे टंकवा लेते हैं। यही वजह है कि सूबे में फर्जी एनकाउंटरों की संख्या काफी अधिक है। कई फर्जी मामलों में अफसरों को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी दे दिया गया।
विज्ञापन


लखनऊ में ही आठ जून 2006 को सुरेश गंगापारी नाम के 20 हजार के जिस इनामी बदमाश को मुठभेड़ में मारकर गोमतीनगर पुलिस ने वाहवाही लूटी थी उसकी कहानी फर्जी निकली। सुरेश से बरामद रिवॉल्वर व खोखों की जब फोरेंसिक एक्सपर्ट से जांच कराई गई तो पाया गया कि खोखे अलग बोर के थे और उन्हें बरामद रिवॉल्वर से चलाया ही नहीं गया था।

सीबी-सीआईडी ने विशेषज्ञों से तीन बार बैलेस्टिक जांच कराई और हर बार एक ही नतीजा सामने आया। इसके अलावा पुलिस पार्टी की तरफ हुई फायरिंग में जिस सर्विस रिवॉल्वर से गोलियां चलने की बात कही जा रही थी, उससे भी फायर नहीं किए गए थे।
विज्ञापन


वहीं, सुरेश के परिवारवालों का कहना था कि पुलिस उसे घर के पास से उठाकर लाई थी और बाद में फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उसकी हत्या कर दी गई। इस मामले में 15 पुलिसकर्मियों को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन भी दे दिया गया था। हालांकि एनकाउंटर फर्जी साबित होने के बाद उन्हीं पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई।

यहां भी झूठा निकला पुलिस का दावा

इसी तरह 30 जून 2007 को बरेली-दिल्ली रोड पर कथित बदमाशों के साथ मुठभेड़ में मुकुल गुप्ता नामक युवक की पुलिस की गोली से मौत हो गई थी जबकि पंकज मिश्रा को मौके से पकड़ा गया था।

बरेली पुलिस का दावा था कि बदमाश सीबीगंज में बैंक लूटने की नीयत से जा रहे थे। जब उन्हें रोकने की कोशिश की गई तो उन्होंने फायर कर दिया। इस मामले में बदायूं निवासी मुकुल के परिवारीजनों ने पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ में मुकुल की हत्या करने का आरोप लगाया था।

कंप्यूटर ऑपरेटर मुकुल बरेली के संजय नगर मोहल्ले में किराए के मकान में रह रहा था। मामला ऊपर तक पहुंचा तो उच्च अधिकारियों ने जांच बदायूं पुलिस को सौंप दी थी। इससे असंतुष्ट परिवारीजनों ने उच्च न्यायालय में गुहार लगाई।

अदालत ने मामले की जांच सीबीआई से कराने का फैसला किया था। सीबीआई ने तफ्तीश के बाद इस मुठभेड़ को फर्जी मानते हुए आईपीएस अफसर जे. रविंद्र गौड सहित 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। इसमें कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी हैं।

अलीगढ़ का राकेश चेचे एनकाउंटर

अलीगढ़ एसओजी के अनुसार, कंट्रोल रूम से मिली सूचना के आधार पर उन्होंने 11 फरवरी 2009 को सिविल कोर्ट के पास मजार के सामने राकेश चेचे को पकड़ा, लेकिन वह और उसका साथी पुलिस पर गोलियां चलाते हुए जमालपुर की ओर भाग निकला।

जवाब में पुलिस की ओर से की गई फायरिंग में वह एसएसपी के सामने मारा गया। दूसरी ओर राकेश के बड़े भाई वीरेश और उसकी मां ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में आरोप लगाए कि राकेश को 10 फरवरी को ही पुलिस ने घर से उठा लिया था और सासानी गेट थाना के लॉकअप में रखा हुआ था।

जांच में आयोग ने पाया कि एसओजी को पुलिस कंट्रोल रूम से कोई संदेश मिला ही नहीं था। सीबी-सीआईडी और मजिस्ट्रेट ने अपनी जांच रिपोर्ट में इस एनकाउंटर को सही ठहराया था, लेकिन मानवाधिकार आयोग ने अपनी तफ्तीश में इसे गलत पाया। उसने 7 जुलाई 2014 को प्रदेश सरकार को आठ सप्ताह में मृतक के परिवार को 5 लाख रुपये की सहायता देने के निर्देश दिए।

पुलिस वालों को फांसी की सजा

मार्च 1982 की एक मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए सीबीआई कोर्ट ने 5 अप्रैल 2013 को तीन पुलिस वालों को फांसी की सजा और पांच पुलिस वालों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

गोंडा के माधोपुर गांव की इस मुठभेड़ में डीएसपी केपी सिंह ने डकैतों के दल को निशाना बनाया था। वहीं पुलिस ने इस मुठभेड़ में 11 गांव वालों के मारे जाने की बात बताई। इसे सच्चा साबित करने के लिए माधोपुर थाने के एसओ आरबी सरोज ने डिप्टी एसपी को भी गोली मार दी थी।

मारने के बाद सभी शवों को गांव के बाहर ले जाकर जला दिया गया था ताकि सुबूत मिटाए जा सकें। इस मामले में कुल 19 पुलिसकर्मियों को सीबीआई ने नामजद किया था।

पूरे देश में ह़ुए 555 फर्जी एनकाउंटर

उत्तर प्रदेश में फर्जी एनकाउंटर के ये मामले महज बानगी भर हैं। ऐसे मामलों की यहा लंबी फेहरिस्त है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक बीते 12 वर्षों में देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश में फर्जी एनकाउंटर के सर्वाधिक मामले सामने आए।

2002 से 2013 के दौरान प्रदेश में 369 एनकाउंटरों पर अंगुली उठाई गई है। आयोग के मुताबिक, यूपी में बीते चार वर्षों में देश में फर्जी एनकाउंटरों की संख्या 555 थी, जबकि अकेले यूपी में 138 फर्जी एनकाउंटर रिपोर्ट की गई।

देश भर में हो रही अपराधियों और पुलिस की जंग में कई पूर्व नियोजित या कहें फिक्स होने और आरोपियों को चुनकर मारे जाने की इन घटनाओं में न केवल पूरे विभाग की भद्द पिटी है, बल्कि प्रदेश की छवि भी दागदार हुई है।
विज्ञापन

वर्ष 2002 से 2008 तक सर्वाधिक मामले

प्रदेश--मामले
उत्तर प्रदेश--231
महाराष्ट्र--31
राजस्थान--33
दिल्ली--26

आंध्र प्रदेश--22
उत्तराखंड--19

वर्ष 2009 से 2013 तक सर्वाधिक मामले
उत्तर प्रदेश--138
मणिपुर--62
असम--52
पश्चिम बंगाल--35
झारखंड--30
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें