गोमती में प्रदूषण रोकने के मामले में सुनवाई के समय नगर निगम की ओर से किसी के पेश न होने पर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा, यह नदी में प्रदूषण को लेकर स्थानीय अफसरों की लापरवाही व उपेक्षा को दिखाता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने नगर आयुक्त को पूरे ब्योरे के साथ 19 अक्तूबर को पेश होने का आदेश दिया है।
मुख्य न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति रजनीश कुमार की खंडपीठ ने यह आदेश सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नाम से वर्ष 2003 से लंबित जनहित याचिका पर दिया। इसमें गोमती को प्रदूषणमुक्त करने का मुद्दा उठाया गया था और समय-समय पर कोर्ट ने आदेश जारी किए थे।
पहले कोर्ट ने शहर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट व गोमती में सीधे बहने वाले सीवेज को लेकर राज्य सरकार, नगर निगम, जल निगम व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्टेटस रिपोर्ट तलब की थी। अदालत ने इन चारों पक्षकारों के वकीलों को हलफनामे पर तीन बिंदुओं पर स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए थे।
अदालत ने इनके वकीलों को रिपोर्ट में यह बताने के लिए कहा था कि कितने नाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़े गए हैं और क्या अब भी बगैर शोधित सीवेज सीधे गोमती में बहाया जा रहा है? इसे सीधे नदी में गिरने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? सुनवाई के समय सरकारी वकील ने मांगे गए दस्तावेज पेश करने के लिए समय मांगा।
वहीं, नगर निगम के अधिवक्ता, जिन्हें गैर शोधित सीवेज के पानी को गोमती में गिरने पर जवाब देना था, पेश ही नहीं हुए। इस पर कोर्ट ने कहा, यह गोमती में प्रदूषण को लेकर प्राधिकारियों की लापरवाही व उपेक्षा को दिखाता है। ऐसे में अगली सुनवाई पर नगर आयुक्त को तलब करने के अलावा विकल्प नहीं है। अगली सुनवाई 19 अक्तूबर को होगी।