फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

...तो बजट का आधा पैसा भी खर्च नहीं कर सके विभाग

Sun, 14 Feb 2016 01:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
भारी भरकम बजट पेश करने वाली अखिलेश सरकार के लिए यह खबर शायद उतनी सुखद नहीं कि दो दर्जन से अधिक  विभाग ने 2015-16 के लिए आवंटित बजट का आधा भी खर्च नहीं किया है। प्रदेश सरकार के वेब पोर्टल कोषवाणी ही इस बात की पोल खोल रहा है।
विज्ञापन


जनवरी तक के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि करीब 15 विभागों ने बीते 10 महीनों में बजट प्रावधान की महज एक चौथाई राशि ही खर्च की है। मंजूर बजट का आधा खर्च करने वाले विभागों की संख्या भी एक दर्जन से ज्यादा है। जबकि, उम्मीद की जाती है कि जनवरी तक कुल बजट राशि का 80 फीसदी पैसा खर्च हो जाना चाहिए।

बजट से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक बजट का करीब 48.6 फीसदी खर्च तो लगभग वेतन-भत्ता, पेंशन और ब्याज के अलावा कर्ज अदायगी के मद में ही हो जाते हैं। यानी इतनी रकम अगले वित्त वर्ष की शुरुआत से पहले हर हालत में खर्च ही हो जाती है।
विज्ञापन


प्लान से जुड़ी योजनाओं के लिए 2015-16 में 21.6 फीसदी रकम का बंदोबस्त किया गया था। पर कई विभागों में इसका बड़ा हिस्सा पड़ा हुआ है। इस रकम को खर्च करने के लिए विभागीय मंजूरी ही लटकी पड़ी है।

इनमें तो 80 फीसदी रकम पड़ी है

वन, हथकरघा, संस्कृति, मुस्लिम वक्फ, उच्च शिक्षा, व्यापार कर, श्रम सेवायोजन व परिवहन जैसे विभागों में  80 फीसदी या इससे ज्यादा रकम खर्च के लिए पड़ी हुई है।

यहां आधा भी खर्च नहीं
नागरिक उड्डयन, पशुधन, पिछड़ा वर्ग कल्याण, कृषि और एलोपैथी चिकित्सा और प्राथमिक शिक्षा जैसे महकमों में 50 फीसदी रकम बिना खर्च की पड़ी है।

...पर इन्होंने तो 80 फीसदी से ज्यादा खर्च किया
कई विभाग ऐसे भी हैं जिन्होंने 80 फीसदी से अधिक रकम खर्च की है। इनमें सहकारिता, दुग्धशाला विकास, गन्ना, वित्त, संस्थागत वित्त जैसे विभाग शामिल हैं।

अब क्या : तेजी से होगा पैसा खर्च, क्वालिटी कैसे आएगी
अब फरवरी और मार्च में दिन-रात कर ये पैसे जारी किए जाएंगे। जाहिर है इन पैसों को खपाने के लिए काम की गुणवत्ता का कितना ख्याल रखा जा सकेगा?

यहां देखें, बजट खर्च करने में विभागों का प्रदर्शन

कम खर्च करने वाले विभाग--खर्च रकम(प्रतिशत में)
वनविभाग--0.89
हथकरघा--10.92
संस्कृति--11.69
मुस्लिम वक्फ विभाग--12.06
उच्च शिक्षा--13.81

व्यापार कर--16.67
श्रम सेवायोजन--16.26
परिवहन--17.75
औद्यानिक एवं रेशम विकास--17.04
माध्यमिक शिक्षा--17.39

खाद्य एवं रसद--18.10
नागरिक उड्डयन--28.14
पशुधन--31.96
पिछड़ा वर्ग कल्याण--34.25
कृषि विभाग--34.27

एलोपैथी चिकित्सा--35.15
परिवार कल्याण--47.21
नगर विकास--45.69
प्राथमिक शिक्षा--41.31
(स्रोत-कोषवाणी, सभी आंकड़े जनवरी 2016 तक के।)

1600 करोड़ बिना खर्च पड़ा हुआ है कृषि में

सरकार का सबसे प्राथमिकता वाला क्षेत्र है कृषि। सरकार ने इस साल को कृषि वर्ष घोषित किया है। विभाग को 2435.68 करोड़ रुपये है। मगर जनवरी तक विभाग ने सिर्फ 1200.28 करोड़ रुपये ही खर्च किए हैं। इसमें भी 834 करोड़ रुपये ही खर्च हुए, यानी करीब 1600 करोड़ रुपये अभी तक खर्च नहीं हुए हैं।

विभागों के धन कम खर्च करने पर यूपी के मुख्य सचिव का कहना है कि इस बार का जो बजट था, वह पिछले कई वर्षों के मुकाबले काफी ज्यादा था। इसके बावजूद पहले की तुलना में ओवरऑल खर्च ज्यादा हुआ है।

कुछ विभागों में जहां कम खर्च हुए हैं, उसकी वजह केंद्र सरकार का केंद्रीय सहायता की फंडिंग में बदलाव करना है। बदलाव की सूचना बहुत देर में दी गई। इसकी वजह से कई विभागों को पैसा नहीं मिला। इसका भी असर पड़ा है।

यहां आधा भी खर्च नहीं

नागरिक उड्डयन, पशुधन, पिछड़ा वर्ग कल्याण, कृषि और एलोपैथी चिकित्सा और प्राथमिक शिक्षा जैसे महकमों में 50 फीसदी रकम बिना खर्च की पड़ी है।

पर इन्होंने 80 प्रतिशत से ज्यादा खर्च किया।
कई विभाग ऐसे भी हैं जिन्होंने 80 फीसदी से अधिक रकम खर्च की है। इनमें सहकारिता, दुग्धशाला विकास, गन्ना, वित्त, संस्थागत वित्त जैसे विभाग शामिल हैं।

अब क्या: आनन-फानन में खर्च होगा पैसा तो क्वालिटी कहां से आएगी।
अब फरवरी और मार्च में दिन-रात कर ये पैसे जारी किए जाएंगे। जाहिर है इन पैसों को खपाने के लिए काम की गुणवत्ता का कितना ख्याल रखा जा सकेगा?

सीएजी उठाती रही है आपत्ति
देर से बजट जारी करने पर सीएजी लगातार आपत्ति उठाती रही है। पिछले तीन सालों में सीएजी की बजट एनालिसिस से जुड़ी रपोर्ट में समय से बजट खर्च न करने की प्रवृत्ति को ठीक नहीं माना गया है।

पैसा खर्च न कर पाने के अपने-अपने तर्क

बजट में मिले पैसों को खर्च नहीं कर पाने को लेकर विभागों के प्रमुखों का अपना-अपना तर्क है। कुछ का तर्क है केंद्र का हिस्सा नहीं मिला इसलिए खर्च कहां से करते तो कुछ के दावे हैं कि मार्च से पहले बजट में मिली रकम का इस्तेमाल हो जाएगा।

जमीन फाइनल होते ही एकमुश्त चला जाएगा पैसा
नागरिक उड्डयन विभाग के सचिव एसके रघुवंशी का कहना है कि चार स्थानों पर एयरपोर्ट के लिए राज्य सरकार एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया को नि:शुल्क भूमि उपलब्ध कराएगी। बरेली में जमीन फाइनल हो गई है। आगरा से कमिश्नर का प्रस्ताव आया है। जमीन फाइनल होते ही हमारा पैसा एकमुश्त चला जाएगा। इसी महीने में जमीन फाइनल होने की उम्मीद है।

हर साल फरवरी-मार्च में ही खर्च होता है
अल्यसंख्यक कल्याण व वक्फ मामलों के सचिव एसपी सिंह कहते है कि अल्पसंख्यक कल्याण में काफी पैसा छात्रवृत्ति का है। इसके आवेदन ही दिसंबर तक भरे जाते हैं। इसलिए हर साल पैसा फरवरी-मार्च में ही खर्च होता है।

जो मिला उसका 80 फीसदी खर्च कर चुके

बेसिक शिक्षा विभाग के सचिव आशीष गोयल कहते हैं कि प्लान वाले बजट में केंद्र सरकार का शेयर भी होता है। केंद्र ने अभी अपने हिस्से की काफी पैसा रिलीज नहीं किया है। हमें जितना पैसा मिला, उसका 80 फीसदी हिस्सा खर्च कर चुके हैं।

केंद्र से पैसा नहीं मिला तो खर्च कहां से हो
सूबे के प्रमुख सचिव कृषि अमित मोहन प्रसाद बताते हैं कि कृषि विभाग का बजट 1300-1400 करोड़ का होता है। इस समय 800-850 करोड़ रुपये खर्च हो चुका है। लेकिन यह दिखता इसलिए नहीं है क्योंकि ढेरों योजनाएं केंद्रीय सहायता के साथ चलती हैं। केंद्र ने इस बार पैसा देर से जारी किया। लेकिन काम होते रहते हैं। पैसा जैसे-जैसे मिलता रहता है, भुगतान होता रहता है।

मार्च से पहले हो जाएगी बसों की खरीद
परिवहन आयुक्त के. रविंद्र नायक का कहना है कि 100 करोड़ रुपये बसों की खरीद का है। मार्च से पहले बसों की खरीद कर ली जाएगी। बाकी योजनाओं में ज्यादातर रकम खर्च कर ली गई है।
विज्ञापन

केंद्र से 1000 करोड़ रुपये मिला ही नहीं

माध्यमिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव जितेंद्र कुमार ने बताया कि माध्यमिक शिक्षा में हमें केंद्र सरकार से 1000 करोड़ रुपये मिला ही नहीं। केंद्र ने या तो ये योजनाएं बंद कर दीं या फिर इन्हें अगले वर्ष के लिए शिफ्ट कर दिया।

इन योजनाओं में करीब 400 करोड़ रुपये राज्य का शेयर था। यानी जब 1400 करोड़ रुपये हमें मिला ही नहीं तो उसे खर्च कहां से करते। उच्च शिक्षा में भी 600 करोड़ रुपये केंद्र से नहीं मिला। जो बजट मिला, उसका ज्यादातर हिस्सा खर्च कर चुके हैं।

बढ़े बजट के अनुपात में विकास का पैसा नहीं
प्रदेश के 2016-17 के बजट की एक तस्वीर और है। बजट बढ़ने के बावजूद विकास के लिए पैसे की हिस्सेदारी घटी।

2015-16 में कुल खर्च का 21.6 फीसदी रकम इस मद में खर्च के लिए प्रस्तावित की गई थी। अगले वित्त वर्ष के बजट का आकार चालू वित्त वर्ष के प्रस्तावित बजट से 14.6 फीसदी बढ़ा है। मगर, जिस रकम से विकास के काम होते हैं यानी पूंजीगत परिव्यय घट कर 21 फीसदी ही रह गया है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें