कर्जमाफी की कटऑफ डेट को लेकर सरकार बृहस्पतिवार को विधानसभा में बुरी तरह फंस गई। दरअसल, राज्यपाल राम नाईक द्वारा 15 मई को विधानमंडल के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में दिए अभिभाषण में 31 दिसंबर 2016 तक के फसली ऋण को माफ करने की बात कही गई जबकि योगी कैबिनेट ने 31 मार्च 2016 तक के फसली ऋण को माफ करने का फैसला किया है।
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विधानसभा में बृहस्पतिवार को संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने राज्यपाल के अभिभाषण में शामिल कटऑफ डेट को तकनीकी व टंकण की त्रुटि बताते हुए इसे संशोधित करके 31 मार्च 2016 करने तथा किसानों के स्थान पर लघु एवं सीमांत कृ षक रखने का प्रस्ताव पेश किया।
विपक्ष ने संविधान, नियमों और परंपराओं का हवाला देते हुए सरकार के इस प्रस्ताव पर अड़ंगा लगा दिया। विपक्ष का कहना था कि अभिभाषण में राज्यपाल की अनुमति के बिना कोई संशोधन नहीं किया जा सकता जबकि सरकार का कहना था कि संशोधन के प्रस्ताव के जरिए ऐसा किया जा सकता है।
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संसदीय कार्य मंत्री ने संशोधन का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि राज्यपाल के अभिभाषण में पेज तीन पर कर्जमाफी की कटऑफ डेट त्रुटिवश 31 दिसंबर 2016 छप गई है। कैबिनेट ने 4 अप्रैल की बैठक में 31 मार्च 2016 तक के फसली ऋण ही माफ करने का फैसला किया है।
अभिभाषण के पेज पर 31-12-2016 की तारीख को संशोधित करके 31-03-2016 कर दिया जाए। उन्होंने किसान शब्द की जगह लघु एवं सीमांत कृषक रखने का प्रस्ताव भी किया। उनका कहना था टंकण की त्रुटि से ऐसा हुआ है। इसे ठीक कर दिया जाए।
लिपिकीय त्रुटि सुधारी जाए
राज्यपाल रामनाईक
- फोटो : demo pic
नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी ने यह कहते हुए आपत्ति की कि राज्यपाल ने जो अभिभाषण प्रस्तुत किया है, उसे वह (विधानसभा अध्यक्ष) भी पढ़ चुके हैं और उस पर सदस्यों के विचार भी आ चुके हैं।
चौधरी ने कहा कि उन्होंने अध्यक्ष व सरकार का सहयोग करने के लिए कल ही यह बात उठाई थी और सचेत किया था कि अभिभाषण संविधान व नियम के विपरीत है, लेकिन न ये (सरकार) माने न आप (अध्यक्ष) माने।
उन्होंने कहा कि कभी ये परंपरा नहीं रही कि राज्यपाल का अभिभाषण या बजट भाषण को सुधारा जा सके। सदन की बात है। चर्चा हो गई है। इसे ऐसे ही रहने दिया जाए।
कोई मुकदमा तो होने जा नहीं रहा। इससे गलत परंपरा पड़ेगी। मेरा भाषण शुरू होने से पहले बदल देते तो भी ठीक था। अब बीच में यह संभव नहीं है। चौधरी ने कहा कि संसदीय कार्यमंत्री को प्रस्ताव लाने का अधिकार ही नहीं है।
सुरेश खन्ना ने पिछली सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा सदस्यों को बांटी गई एक पुस्तक का हवाला देते हुए कहा कि उसमें बहुत सी रूलिंग थीं। उसमें यह भी था कि अगर कोई लिपिकीय त्रुटि हो गई है उसे सुधारा जाए। उन्होंने कहा कि राज्यपाल संदेश भेजें, यह संभव नहीं है। हम सुधार सकते हैं।
विधिक राय लेकर करें निर्णय
विधान सभा
- फोटो : अमर उजाला
राम गोविंद चौधरी ने कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि पानी सिर से ऊपर जा रहा है। रोज नई परंपरा पड़ेगी? संयुक्त सदन था। अभिभाषण कई विभागों से बनता है, फिर कैबिनेट से पास होता है।
इसके बाद राज्यपाल पढ़ते हैं। कोई संशोधन था तो पहले ही होता। चौधरी ने कहा कि पूरा अभिभाषण वापस हो तथा सत्र कैंसिल करके पुन: इसे लाया जाए। संशोधन संवैधानिक, नियमानुकूल व परंपरा के अनुकूल नहीं है।
खन्ना इस पर अड़े रहे कि संशोधन प्रस्ताव के जरिए अभिभाषण में संशोधन किया जा सकता है और सदन को इसका अधिकार है। इसे चुनौती नहीं दी जा सकती जबकि विपक्ष इसे लगातार गलत बता रहा था।
लालजी वर्मा ने नियमावली का हवाला देते हुए कहा कि अभिभाषण में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। बाद में कुछ जोड़ा जरूर जा सकता है। यह विधिक विषय है। कोई नई पंरपरा न बने इसलिए सरकार को विधिवेत्ताओं की राय लेकर सोच-विचार के बाद निर्णय करना चाहिए।
खन्ना ने कहा कि वह भी नहीं चाहते कोई गलत परंपरा बने, इसलिए महाधिवक्ता की राय तथा अन्य विकल्पों के साथ शुक्रवार को फिर प्रस्ताव पेश कर देंगे। चौधरी ने लोकसभा की नियमावली का हवाला देते हुए कहा कि संवैधानिक प्रमुख के अभिभाषण में बिना उनकी अनुमति के कोई बदलाव नहीं हो सकता।
इस मुद्दे पर लंबी चर्चा के बाद अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने सरकार को कानूनी राय तथा अन्य विकल्पों के साथ इस प्रस्ताव को शुक्रवार को दोबारा सदन में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
उन्होंने कहा कि जहां तक वह समझ पाए हैं, जब तक अभिभाषण दिया नहीं जाता, तब तक तो संशोधन हो सकता है। सदन में आने के बाद वह सदन की संपत्ति हो जाता है और सदस्यों को ही संशोधन का अधिकार होता है।
सदस्य संशोधन देते भी हैं। नेता प्रतिपक्ष व नेता बसपा ने विधिक राय लेने का सुझाव दिया है। उन्होंने सरकार को निर्देश दिए कि यह प्रक्रिया पूरी करके शुक्रवार को सदन में दोबारा प्रस्तुत किया जाए।