मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अब्बाजान, कांवड़ यात्रा पर पुष्पवर्षा व डीजे बजाने की इजाजत देना, जुमा पर होली पड़ने पर यह एलान कि होली साल में एक बार आती है जुमा तो हर महीने होता है जैसी टिप्पणियां व काम भले ही कथित बौद्धिक वर्ग को बहस का मुद्दा देती हों, लेकिन यह आक्रामक टिप्पणियां वर्षों से तुष्टीकरण के कारण अपनी अनदेखी झेलने वाले हिंदुओं के काफी बड़े वर्ग को उनके साथ खड़ा करती हैं। ऊपर से अयोध्या में दिवाली, मथुरा के बरसाना में होली, काशी में देवदीपावली, प्रयागराज में कुंभ के प्रबंधन ने भी हिंदुओं के बीच उनकी पकड़ व पैठ काफी मजबूत की है। लविवि के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि साढ़े चार साल की सरकार के दौरान योगी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी विकास के साथ वह आक्रामक हिंदुत्व ही है जिसने उन दलों को मंदिर जाने, खुद को हिंदू बताने तथा अपना चुनाव अभियान अयोध्या से शुरू करने को मजबूर कर दिया जो चार साल पहले मुस्लिम वोटों की नाराजगी के भय से इनसे दूर रहते थे। योगी ने हिंदुत्व पर सिर्फ भाषण नहीं दिए हैं, बल्कि लव जिहाद पर कानून बनाकर, धर्मांतरण पर नियंत्रण को कदम उठाकर, जनसंख्या नियंत्रण कानून पर आगे बढ़कर हिंदुओं को यह भरोसा भी दिया है कि उनके हित सुरक्षित हैं। जाहिर है कि चुनाव में योगी ही प्रदेश में हिंदुत्व के इस भाव को वोटों में बदल सकते हैं। रही बात संजय निषाद की भाजपा के साथ चुनाव लड़ने की औपचारिक घोषणा की तो यह भी भाजपा की समग्र हिंदुओं की लामबंदी की रणनीति है।
ये भी है अहम वजह
प्रो. द्विवेदी का निष्कर्ष सही है। संजय निषाद की पार्टी का कितना प्रभाव है या कितनी सीटों को वह प्रभावित करते हैं, यह बहस का मुद्दा हो सकता है, लेकिन राजनीति में प्रतीकों व संकेतों के संदेशों का बड़ा महत्व होता है। उस लिहाज से संजय निषाद का भाजपा के साथ चुनाव मैदान में जाने का एलान एक तरह से उन छोटे दलों के नेताओं को जो हिंदुओं के छोटे-छोटे वर्गों व जातियों के समूहों का नेतृत्व करते हैं को भी साथ आने का आमंत्रण है। जाहिर है कि भाजपा की कोशिश किसी न किसी तरह पूरे हिंदू समाज को एकजुट करना है। ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि ओमप्रकाश राजभर जैसे नेता भी जल्द ही किसी न किसी भूमिका में भाजपा के साथ खड़े दिखें।