बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद की यूपी में वापसी के बावजूद उनके कद को सीमित करने और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को निष्कासित करने के फैसले ने संगठन से लेकर चुनाव की तैयारियों तक गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। आकाश की यूपी में बढ़ती सक्रियता को लेकर बसपा के युवा समर्थकों का उत्साह ठंडा पड़ रहा है तो संगठन में भी असंतोष बढ़ने के आसार हैं।
बता दें कि आकाश को यूपी की जिम्मेदारी मिलने के बाद पार्टी के युवा समर्थक काफी उत्साहित थे और सोशल मीडिया पर इसे लेकर उनकी सक्रियता बढ़ गई थी। आकाश की सोशल मीडिया टीम भी इसे खासा प्रचारित कर रही थी। अचानक अशोक सिद्धार्थ और रणधीर सिंह बेनीवाल के निष्कासन से ये गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं।
ये भी पढ़ें - सपा का हंगामा, बोले- चंदा चोर गद्दी छोड़; डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने दिया जवाब; तस्वीरें
ये भी पढ़ें - सीएम योगी की बड़ी घोषणा, बोले- एक-डेढ़ सप्ताह में लागू होगा आउटसोर्स कमीशन, न्यूनतम मानदेय होगा सुनिश्चित
फिलहाल पूरे प्रकरण पर पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने चुप्पी साध ली है और प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। अब सबकी नजरें आगामी 10 अगस्त को हाथरस के सादाबाद और 25 अगस्त को नोएडा के जेवर में आकाश की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले कार्यकर्ता सम्मेलनों पर टिकी हैं। वहीं दूसरी ओर मुरादाबाद से भी आकाश की अध्यक्षता में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करने की डिमांड हो रही है।
पूर्व मंत्री धर्मवीर अशोक की वापसी
बसपा सुप्रीमो ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शुमार पूर्व मंत्री धर्मवीर अशोक को वापस लेने का फैसला लिया है। उन्हें बीते अप्रैल में पूर्व नेशनल कोआर्डिनेटर जयप्रकाश के साथ निष्कासित कर दिया गया था। धर्मवीर बसपा के संस्थापक कांशीराम के करीबी रह चुके हैं और पार्टी की स्थापना के साथ जुड़े रहे हैं। उनकी वापसी से बसपा को पश्चिमी यूपी में मजबूती मिलेगी। बुलंदशहर निवासी धर्मवीर बसपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। उनकी संगठन में अच्छी पैठ मानी जाती है।
हंगामे की भेंट न चढ़ जाए सदन : मायावती
वहीं, सोमवार को विधानमंडल के मानसून सत्र की शुरूआत से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि लोगों की अपेक्षा है कि यह संसद के वर्तमान सत्र की तरह ही संकीर्ण दलगत राजनीति, खींचतान, आरोप-प्रत्यारोप व हंगामे की भेंट न चढ़ जाए। ब्यूरोक्रेसी को जवाबदेह और जनहित के प्रति उत्तरदायी बनाए रखने के लिए जरूरी है कि विधायिका का सांविधानिक प्रभाव किसी भी प्रकार से कम न होने पाए। संविधान व लोकतंत्र की मजबूती और अफसरशाही पर लगाम के लिए विधायिका की मजबूती महत्वपूर्ण है। इसके लिए सरकार व विपक्ष दोनों को गंभीर संसदीय आचरण दिखाना चाहिए।