नामांकन करते स्वामी प्रसाद मौर्य
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तमाम चर्चाओं पर विराम देते हुए राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने कुशीनगर लोकसभा से नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। इससे पहले वह समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस से टिकट की संभावनाएं तलाश रहे थे। बात न बनने पर अपनी ही पार्टी से चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। स्वामी प्रसाद का ये कदम सपा को नुकसान पहुंचा सकता है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में स्वामी प्रसाद पड़ोस की देवरिया लोकसभा सीट के अंतर्गत फाजिलनगर से सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे और हार गए थे। सपा छोड़ने के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि स्वामी प्रसाद मौर्य की बहुजन समाज पार्टी में वापसी हो सकती है। बसपा उन्हें कुशीनगर से उम्मीदवार बना सकती हैं, लेकिन मामला नहीं बना। बृहस्पतिवार को बसपा ने कुशीनगर सीट से शुभ नारायण चौहान को टिकट दे दिया। दरवाजे बंद होते ही स्वामी प्रसाद ने खुद को अपनी ही पार्टी से कुशीनगर सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया। सपा ने यहां से अजय प्रताप सिंह उर्फ पिंटू सैंथवार को टिकट दिया है जबकि भाजपा से विजय दुबे एक बार फिर संसद पहुंचने के लिए मैदान में हैं।
स्वामी प्रसाद सपा, बसपा और भाजपा तीनों दलों में रह चुके हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा छोड़ सपा में आ गए लेकिन चुनाव हार गए। सपा ने उन्होंने एमएलसी बनाकर महासचिव की जिम्मेदारी दी। इस वर्ष फरवरी में राज्यसभा चुनाव के दौरान पीडीए की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए सपा भी छोड़ दी। साथ ही विधान परिषद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया।
हवा में उड़ जाएगा इंडिया गठबंधन भी
पूर्व कैबिनेट मंत्री और राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि अभी उन्होंने पर्चा भरा है। कुछ दिन बाद भाजपा और इंडी गठबंधन हवा में उड़ जाएंगे। स्वामी प्रसाद का दावा है कि इंडी गठबंधन ने यहां डमी प्रत्याशी उतारा है और कुशीनगर में भाजपा अपना जनाधार खो चुकी है। दोनों पार्टियों के प्रत्याशी लड़ाई से बाहर हैं।
स्वामी प्रसाद ने बृहस्पतिवार को नामांकन दाखिल करने के बाद एक सभा में कहा कि भाजपा ने इस बार 400 पार का नारा इसलिए दिया है ताकि वह चुनाव जीतने के बाद संविधान को बदल सके। हम यह चुनाव संविधान बचाने के लिए लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा झूठ की राजनीति करती है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले यहां आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पडरौना चीनी मिल को 100 दिन के अंदर चलाने का वादा किया था। मगर, दस साल का समय बीतने के बाद भी चीनी मिल नहीं चल सकी है। रोजगार के मुद्दे पर भाजपा सरकार हर स्तर पर फेल है।