प्राकृतिक हीरा धरती के गर्भ में 150 किलोमीटर नीचे बेहद उच्च तापमान में 10 लाख साल में तैयार होता है। भूकंप व ज्वालामुखी फटने से मैग्मा के साथ ऊपर आता है। इसे दस किलोमीटर नीचे खदान से निकाला जाता है। इन कच्चे हीरों को बाहर निकालकर तराशा जाता है। कटिंग व पालिश के बाद ये अलग-अलग रूप में तैयार होते हैं।
नकली हीरा कैसे बनता है
ये हीरे लैब में तैयार होते हैं इसीलिए इन्हें शार्ट में एलजीडी भी कहा जाता है। ये दो तरीके से लैब में बनते हैं। पहला हाई प्रेशर हाई टेम्पेरचर (एचपीएचटी) और दूसरा केमिकल वेपर डिस्पोजिशन (सीबीडी)। ये डायमंड का रियेक्टर होता है, जिसमें इसे तैयार किया जाता है। इन रिपेक्टरों से एक हीरा 7-15 दिन में ही बन जाता है।
असली के नाम पर नकली न खरीद लें
असली और नकली हीरे में पहचान कर पाना बेहद मुश्किल है। असली के नाम पर नकली हीरा कोई न थमा दे, इससे बचने के लिए सर्टिफिकेट जरूर लें, जिसमें नेचुरल डायमंड साफ लिखा हो। भरोसेमंद और साख वाले ज्वैलर्स से ही खरीदें जिसके पास हीरे की पहचान करने वाला हाईटेक माइक्रोस्कोप हो।
जेमोलाजिकल इंस्टीट्यूट के सर्टिफाइड जेमोलाजिस्ट श्रेयांस कपूर का कहना है कि असली हीरा दस लाख साल में प्रकृति तैयार करती है जबकि लैब में ये 15-20 दिन में तैयार हो जाता है। हीरा प्यार, समर्पण और रिश्तों का प्रतिबिंब माना जाता है। यही वजह है कि लैब में तैयार होने वाले नकली हीरों की कीमत महज चार वर्ष में 90 फीसदी तक गिर गई है। आने वाले एक साल में इसमें और गिरावट आएगी। वहीं प्राकृतिक हीरे की मांग दोबारा तेज होने से इसने 10 से 15 फीसदी तक रिटर्न दिया है।