लोकसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन पर इतराती सपा को उसका एटिट्यूड और ओवर कॉन्फिडेंस ले डूबा। तब सपा गठजोड़ इन नौ में से छह सीटों पर आगे रहा था, इस बार महज दो में ही सिमट गई। कार्यकर्ताओं के अनमनेपन ने भी उसका नुकसान किया। सपा मुखिया अखिलेश यादव सबको साथ लेकर चलने की कला में चूक गए। गठबंधन धर्म को धता बताते सपा ने सात सीटों पर एकतरफा अपने प्रत्याशी तय कर दिए। कांग्रेस को जो दो सीटें दीं, वो कांग्रेस ने खुद ही लौटा दी। कांग्रेसी उनके चुनाव में कतई न जुटे। प्रत्याशियों को पसंद करने में पुराने राजनीतिक परिवारों को तवज्जो नुकसानदेह साबित हुई। कटेहरी के सपा विधायक लालजी वर्मा सांसद बने तो ढाई साल बाद उनकी जगह उनके पत्नी को उतार दिया गया। कार्यकर्ताओं को नागवार गुजरा तो नतीजा सामने है। कुंदरकी में सपा प्रत्याशी की छवि का ध्यान नहीं रखा तो खुद उनका वोट बैंक ही भाजपा की तरफ खिसक गया, बंटेंगे तो कटेंगे की गूंज को अनसुनी करता हुआ। करीब डेढ़ लाख वोटों से यह हार-जीत चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व है।
सपा मुखिया ने अपनी पुश्तैनी सीट करहल पर अपने चचेरे भाई तेजप्रताप यादव को उतारा और यहां भी झटका खाया। यहां पिछले चुनाव के मुकाबले हार-जीत का फर्क घटकर 64 हजार से 14 हजार पर रह गया। यानी उसके वोटबैंक में सेंधमारी उसके गढ़ तक आ पहुंची है। पीडीए का नारा देकर परिवारीजन को प्रमुखता दिया जाना कहीं न कहीं समर्थकों के साथ-साथ वोटरों को भी खटका।
इस चुनाव में कुछ हैरतअंगेज घटनाएं भी हुईं। मुस्लिम वोटों के रहनुमा बनने को बेताब असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने मीरापुर से पहली बार चुनाव लड़कर 18 हजार से ज्यादा वोट झटक लिए। मायावती की ठेकेदारी को चुनौती देने वाले दबंग दलित नेता चंद्रशेखर की पाटी ने कुंदरकी और मीरापुर दोनों जगह बसपा को पीछे धकेल दिया। 60 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली कुंदरकी में झाराझार वोट पड़े लेकिन मुस्लिम वोट ऐसे बंटे कि भाजपा प्रत्याशी को रिकॉर्ड जीत दिला दी। आखिर में गौरतलब...नतीजों को वन मैन शो बताने वाले एक अखाड़े की नजर में-एक छोटी राजधानी ने बड़ी राजधानी के एक हाईपॉवर ग्रुप को झटकेदार संदेश दे दिया है।