सूबे में भाजपा के भीतर व बाहर इन दिनों यूपी के नेताओं के भविष्य का सवाल चर्चा का मुद्दा बनता जा रहा है। खासतौर से आपदा पीड़ित किसानों के आंसू पोंछने के लिए दूसरे राज्यों से मंत्रियों को यूपी में भेजने के बाद आम कार्यकर्ताओं में यह मुद्दा मथने लगा है।
अटकलें लग रही हैं कि यूपी के कुछ भाजपा नेताओं को भी कहीं लालकृष्ण आडवाणी की तरह संरक्षक व मार्गदर्शक जैसी भूमिका सौंपकर वानप्रस्थ पर भेजने की तैयारी तो नहीं है।
यह अटकलें यूं ही नहीं हैं। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह सिर्फ मोदी मंत्रिपरिषद में ही दूसरे स्थान पर ही नहीं है बल्कि यूपी में भाजपा के किसान नेता भी माने जाते हैं।
उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में किसानों के लिए कई योजनाएं भी शुरू की लेकिन उनके उत्तर प्रदेश आने से दो दिन पहले दूसरे राज्यों के मंत्रियों को किसानों के आंसू पोंछने के लिए भेजने से इन अटकलों को ज्यादा बल मिल रहा है लेकिन भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं। उनका कहना है कि इसके राजनीतिक निहितार्थ नहीं तलाशे जाने चाहिए।
मंत्रिपरिषद सामूहिक जिम्मेदारी के तहत काम करता है। इसलिए कहीं भी किसी मंत्री को भेजा जा सकता है। यूपी के नेताओं को भी दूसरे राज्यों में भेजा जाता है लेकिन यह तर्क आसानी से गले नहीं उतर रहा है।
छिपी हुई है यूपी भाजपा की राजनीति
गहराई से नजर दौड़ाएं तो सूबे से राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, उमा भारती, संतोष गंगवार, संजीव बालियान जैसे चेहरों के मंत्री होते हुए नितिन गडकरी (महाराष्ट्र), हरिभाई चौधरी (गुजरात) व रामकृपाल सिंह (बिहार) को यूपी के किसानों के आंसू पोंछने भेजना साधारण बात नहीं है। इसके पीछे कहीं न कहीं भविष्य की यूपी भाजपा की राजनीति की आहट सुनाई दे रही है।
इनसे निकल रहे संकेत
बंगलूरू बैठक में राजनाथ सिंह को मंच पर जगह न देने, डॉ. मुरली मनोहर जोशी को मंत्रिपरिषद में शामिल न करने और अब केंद्रीय मंत्रिपरिषद में यूपी की अच्छी-खासी मौजूदगी होते हुए इनमें से किसी को किसानों के आंसू पोंछने की जिम्मेदारी न देकर दूसरे राज्यों के लोगों को भेजना बहुत कुछ कह जाता है। लोगों की नजर में यह सब सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है।
अगर सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होता और मामला सिर्फ उम्रदराज हो चले नेताओं को विश्राम देने तक का ही होता तो संजीव बालियान, महेश शर्मा, मुख्तार अब्बास नकवी से लेकर साध्वी निरंजन ज्योति जैसे यूपी से जुड़े अपेक्षाकृत युवा मंत्रियों को भेजा जा सकता था।
इसके बजाय दूसरे राज्यों के नेताओं को भेजने से यह बात साफ हो रही है कि पार्टी हाईकमान यूपी की लड़ाई को अपनी देखरेख व रणनीति के लिहाज से अपने लोगों के सहारे ही लड़ना चाहता है।