बलरामपुर अस्पताल में करीब 776 बेड हैं। औसतन 600 से अधिक मरीज हर वक्त अस्पताल में भर्ती रहते हैं। अस्पताल प्रशासन हर रोज करीब 400-500 मरीजों के लिए खाना बनवाता है। ऐसे में साफ है कि तीमारदारों के लिए अस्पताल में खाना नहीं बन रहा है। तीमारदार बाहर से खाना खरीद कर खा रहे हैं।
बुरा हालः एक वक्त की डाइट पर दे रहे सिर्फ 11 रुपये
स्वास्थ्य विभाग की ओर से खाने के बजट में कोई इजाफा नहीं किया है। एक वक्त की डाइट के लिए करीब 11 रुपये ही तय है। इतनी कम लागत में बनने वाले खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठना लाजिमी है।
केजीएमयू के गैस्ट्रो सर्जरी विभाग में स्टाफ व नर्स के संकट की वजह से बृहस्पतिवार को एक ओटी बंद कर दी गई। विभाग के एक डॉक्टर ने यह पीड़ा केजीएमयू के ह्वाट्सएप ग्रुप पर बयां की। विभाग में एक ओटी का संचालन होने से कई मरीजों के ऑपरेशन भी टल गए।
शताब्दी भवन-फेज वन में गैस्ट्रो सर्जरी विभाग में एक माह से नर्स व स्टाफ का संकट बना हुआ है। यहां दो ओटी के संचालन के लिए सिर्फ तीन नर्सें हैं। इसमें भी एक नर्स लंबी छुट्टी पर चली गई है। स्टाफ की कमी से डॉक्टर ऑपरेशन नहीं कर पा रहे हैं।
नर्स व स्टाफ की तैनाती के लिए डॉक्टरों ने केजीएमयू अफसरों से कई दफा कहा, मगर सुनवाई नहीं हुई। इससे आहत डॉक्टरोें ने बृहस्पतिवार को एक ओटी का संचालन बंद कर दिया। विभाग के एक डॉक्टर ने संस्थान के ह्वाट्सएप ग्रुप पर दर्द बयां किया। विभाग की ओटी में दो ही ऑपरेशन हो सके। दूसरी ओटी बंद रही।
दोनों ओटी चल रही
दोनों ओटी का संचालन हो रहा है। नर्स व स्टाफ का संकट है। दो डॉक्टरों की आपसी झगड़े की वजह से यह मसला ग्रुप पर डाला गया है। कोई भी ऑपरेशन नहीं टल रहे हैं।
- डॉ. अभिजीत चंद्रा विभागाध्यक्ष, गैस्ट्रो सर्जरी
बलरामपुर अस्पताल में जांचों के लिए जरूरी रिजेंट खत्म होने से थायरॉइड समेत कई महंगी जांचें ठप हो गई हैं। मरीज जांच के लिए निजी सेंटर जाने को मजबूर हैं। बलरामपुर अस्पताल की पैथोलॉजी व आरडीसी में थायरॉइड, विटामिन डी 3 व हड्डी की जांच के लिए आरए फैक्टर की जांच बृहस्पतिवार को नहीं हुई।
डॉक्टर के जांच लिखने पर मरीज काउंटर पर पहुंचे तो उन्हें जांच बंद होने की बात कहकर वापस कर दिया गया। इसे लेकर मरीज की कर्मचारियों से नोकझोंक भी हुई। आरोप है कि अस्पताल में दो दिन से जांचें बंद चल रही हैं।
हर रोज करीब 50-60 मरीज बिना जांच लौटाए जा रहे हैं। अस्पताल के प्रवक्ता एसएम त्रिपाठी के मुताबिक, रिजेंट की आपूर्ति जल्द की जाएगी। इस मामले से अधिकारियों को अवगत कराया जाएगा।
लोहिया संस्थान के हॉस्पिटल ब्लॉक में अब मरीजों को जरूरत की दवाएं नहीं मिल रही हैं। हालत यह है कि अगर डॉक्टर किसी मरीज को पांच दवाएं लिख रहा है तो उसमें सिर्फ एक दवा ही उसे हॉस्पिटल से मिल रही है। सुविधा संपन्न लोग तो दवाएं बाहर से खरीद ले रहे हैं, लेकिन गरीब मरीजों के सामने समस्या खड़ी हो गई है।
पहले ड्रग कॉर्पोरेशन की ओर से अस्पताल को करीब पांच सौ दवाएं दी जाती थीं। इसमें आई ड्रॉप से लेकर पैरासिटामॉल तक शामिल होता था। विलय के बाद कॉर्पोरेशन ने दवाएं देनी बंद कर दी है। ऐसी स्थिति में यहां करीब पांच सौ के बजाय करीब सौ दवाएं बची हुई हैं।
इसमें भी एंटीबायोटिक्स, जोड़ों के दर्द, पेट की दवाएं नहीं हैं। लोहिया संस्थान के मेडिकल स्टोर के सूत्रों का कहना है कि करीब सौ दवाओं में तमाम जरूरी दवाएं 100 टैबलेट से भी कम हैं। ऐसे में फरवरी भी मुश्किल से गुजर पाएगा। इसी तरह यहां इंजेक्शन की भी कमी है।
लोहिया के हॉस्पिटल ब्लॉक में डायलिसिस यूनिट निर्माण कार्य के चलते बंद पड़ी है। इससे मरीजों की डायलिसिस नहीं हो पा रही है। मरीजों को निजी सेंटर जाना पड़ रहा है। इसे लेकर बृहस्पतिवार को अस्पताल निदेशक ने डायलिसिस यूनिट का निरीक्षण किया।
कार्यदायी संस्था को हफ्तेभर में काम पूरा करने के निर्देश दिए। हॉस्पिटल ब्लॉक में पांच डायलिसिस मशीनें हैं। रोज 15-20 मरीजों की डायलिसिस होती है। एसी प्लांट व फॉल्स सीलिंग लगने की वजह से डायलिसिस का काम बंद पड़ा था।
निदेशक डॉ. एके त्रिपाठी, हॉस्पिटल ब्लॉक के एमएस डॉ. देवाशीष शुक्ला ने यूनिट का निरीक्षण किया। निर्माण कार्य हफ्ते भर में पूरा करने के निर्देश दिए हैं।