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'न हम फेसबुक में आ सकते हैं और न ही टिकट करा सकते हैं'

Sat, 15 Aug 2015 09:38 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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भारत में ट्रांसजेंडर की हालत बुरी है। वह न तो फेसबुक पर अपना अकाउंट खोल सकते हैं और न ही ऑनलाइन टिकट बुक करा सकते हैं।
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‘मैं ट्रांसजेंडर हूं, इसलिए फेसबुक पर अपना अकाउंट नहीं बना सकता। सोशल मीडिया ही नहीं, ट्रेन या फ्लाइट की टिकट बुक करने वाली साइट्स का भी यही हाल है। वहां भी हमारे लिए कोई कॉलम नहीं है।’

ट्रांसजेंडर्स के हितों के लिए काम कर रहे दीपक कुमार ने इन शब्दों में ट्रांसजेंडर्स की पीड़ा को बयां किया। वे शुक्रवार को लखनऊ के चारबाग स्थित एक होटल में ‘पहचान’ संस्था के ‘हिजड़ा-हिब्बा’ कार्यक्रम में बोल रहे थे।
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उनका कहना था कि हमारी पूरी लड़ाई मुख्य धारा के समाज में अपनी पहचान बनाने की है। सुप्रीम कोर्ट भी इसके लिए आदेश दे चुका है, लेकिन हमें मिला क्या?

आज के दौर में सोशल मीडिया पर खुद को रखना बहुत जरूरी हो गया है, लेकिन फेसबुक पर अकाउंट बनाते समय सिर्फ महिला या पुरुष का ही जिक्र है। ट्रांसजेंडर का विकल्प ही नहीं है। यही हाल दूसरी सोशल मीडिया साइटों का भी है।
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सुप्रीम कोर्ट दे चुका है आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ट्रांसजेंडर्स को पहचान दिलाई। इसके बावजूद उनके लिए सुविधाओं के रास्ते बंद हैं। रेलवे की ऑनलाइन बुकिंग के लिए आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर भी ट्रांसजेंडर्स का कॉलम नहीं है।

फ्लाइट की टिकट बुक करनी हो तो खुद को पुरुष या महिला ही बताना होगा। ऐसा नहीं करने पर आपकी टिकट ही बुक नहीं हो पाएगी। कॉलेजों या यूनिवर्सिटी में भी हमें एडमिशन नहीं मिल सकता क्योंकि हम ट्रांसजेंडर्स हैं। लखनऊ में यूनिवर्सिटी तय करती हैं कि ट्रांसजेंडर्स को किन कॉलेजों में एडमिशन दिया जाए किनमें नहीं।

कोर्ट ने माना ‘थर्ड जेंडर’

15 अप्रैल 2014 को दिए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता दी थी। इसके साथ ही राज्य व केंद्र सरकार को जरूरी कदम उठाए जाने के आदेश भी हुए। अप्रैल 2015 में राज्यसभा भी ट्रांसजेंडरों के लिए एक बिल पास कर चुकी है। द राइट्स ऑफ ट्रांसजेंडर पर्सन्स बिल, 2014 को लोकसभा से भी पास कराने के लिए केंद्र सरकार आश्वासन दे चुकी है। इसके बाद यह कानून बन जाएगा।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के जीएम डॉ. अनिल मिश्रा ने बताया कि ट्रांसजेंडर्स के लिए प्राथमिकता पर स्वास्थ्य कार्यक्रम की जरूरत है। इसके लिए एनएचएम में काम किया जा सकता है। उन्होंने ‘पहचान’ संस्था के अधिकारियों से एक कोर ग्रुप बनाने के लिए कहा जो आपस में संपर्क में रहे। इससे सूबे के सभी 75 जिलों में उन्हें इलाज की सुविधा दिलाई जा सकेगी।

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