यूपी की राजधानी लखनऊ में अचानक पर्यटक आने से कतरा रहे हैं। अब सैलानी दिल्ली-आगरा से लखनऊ आने की जगह सीधे बनारस जा रहे हैं।
दरअसल,इमामबाड़ों पर तालाबंदी का असर पर्यटन पर पड़ रहा है। पर्यटक लखनऊ से कतराने लगे हैं। दिल्ली,आगरा से आने वाले टूरिस्ट लखनऊ की जगह सीधे बनारस व इलाहाबाद का रुख कर रहे हैं। यही कारण है कि आंदोलन से पहले जहां आठ हजार पर्यटक रोजाना लखनऊ आते थे, उनकी संख्या घटकर चार सौ रह गई है।
जिसका खामियाजा पर्यटन के साथ-साथ तांगेवालों, चिकन कारीगरों व गाइडों को भी भुगतना पड़ रहा है।शिया वक्फ बोर्ड में वसीम रिजवी की नियुक्ति व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आजम खां से नाराजगी के चलते शिया धर्मगुरू मौलाना कल्बे जव्वाद व उनके समर्थकों ने 15 दिन पहले छोटे व बड़े इमामबाड़ों पर तालाबंदी की थी।
मौलाना की मांग थी कि इमामबाड़े इबादत की जगह है, न कि पर्यटन की। चूंकि,इमामबाड़े हुसैनाबाद ट्रस्ट के अंतर्गत आते हैं, जिससे ट्रस्ट को रोजाना एक से सवा लाख रुपये की आमदनी होती थी। इसलिए तालेबंदी से अब तक करीब 25 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है।
टूरिज्म इंडस्ट्री में खराब हुई लखनऊ की छवि
ट्रेवल एजेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की यूपी व उत्तराखंड चैप्टर के चेयरमैन सुनील बी.सत्यवक्ता बताते हैं कि सितम्बर से टूरिज्म का पीक सीजन शुरू हो रहा है,जिसमें विदेशियों की आमद अधिक होती है। इसकी तैयारियों में टूर ऑपरेटर्स लगे हैं। लेकिन बुकिंग के दौरान पर्यटकों को हालात बताने पर पर्यटक लखनऊ से कट रहे हैं।
तालाबंदी से पहले तक रोजाना सात से आठ हजार पर्यटक लखनऊ आते रहे हैं,जो अब घटकर चार-पांच सौ रह गए हैं और जो आ भी रहे हैं,वे मायूस लौट रहे हैं। बेहतर होता कि आंदोलन को ईद तक टाल दिया जाता।
वहीं पर्यटन विशेषज्ञ प्रतीक हीरा का कहना है कि एक ओर सरकार हेरिटेज आर्क, हेरिटेज जोन तैयार कर रही है। दूसरी ओर इमामबाड़ों पर तालेबंदी से लखनऊ की इमेज टूरिज्म इंडस्ट्री में खराब हो रही है।
चूंकि,पर्यटन स्थलों का प्रचार-प्रसार माउथ पब्लिसिटी से अधिक होता है,इसलिए इस समय लखनऊ की नेगेटिव पब्लिसिटी हो रही है। जिसका दूरगामी परिणाम पर्यटन इंडस्ट्री को भुगतना पड़ेगा। आखिर सरकार व ट्रस्ट इतना बेबस क्यों है कि उसका नुकसान पर्यटन उद्योग उठा रहा है।