सूत्रों का कहना है कि बिजली कंपनियों को सबसे ज्यादा नुकसान रियायती बिजली देने की वजह से उठाना पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में 18 घंटे बिजली आपूर्ति की जा रही है। उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाने में प्रति यूनिट लागत सात रुपये से ज्यादा आ रही है जबकि औसत वसूली दो-तीन रुपये यूनिट से ज्यादा नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में हर महीने 1200 करोड़ से ज्यादा की बिजली दी जाती है जबकि राजस्व बमुश्किल 300-350 करोड़ ही वसूल हो पा रहा है। इसी तरह पावरलूम सेक्टर को हर महीने लगभग 800 करोड़ रुपये की बिजली दी जा रही है, जबकि सरकार की ओर से सब्सिडी के नाम पर महज 150 करोड़ रुपये ही मिल पा रहे हैं।
तलाशे जा रहे आमदनी बढ़ाने के उपाय
सूत्रों का कहना है कि केंद्र के सख्त रुख को देखते हुए पावर कॉर्पोरेशन आमदनी बढ़ाने के उपाय में जुटा है, लेकिन इसमें वक्त लगने की संभावना है। शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बकायेदारों से राजस्व वसूली के लिए नवगठित पुलिस थानों की मदद लेने की तैयारी है। सरकारी विभागों पर बकाया 10 हजार करोड़ रुपये की वसूली के लिए शासन को पत्र भेजा जा रहा है। सरकार से सब्सिडी मांगने का प्रस्ताव भी तैयार कराया जा रहा है। सूत्रों का कहना है फिलहाल तो बिना सरकार की सहायता के अगले महीने से शेड्यूल के हिसाब से बिजली आपूर्ति हो पाना मुश्किल ही नजर आ रहा है।
वितरण कंपनियां राज्य सरकार के नियंत्रण वाले स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (एसएलडीसी) पर भी दबाव डालकर बिना भुगतान के बिजली नहीं ले पाएंगी। केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने बुधवार को जारी अपने आदेश में पहले केवल उत्तरी क्षेत्र लोड डिस्पैच सेंटर (एनआरएलडीसी) पर ही वितरण कंपनियों की निगरानी करने की जिम्मेदारी डाली थी। कुछ ही घंटे में बिजली मंत्रालय ने अपने आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए एसएलडीसी को भी सख्त हिदायत दे दी है कि बिना एडवांस भुगतान या उत्पादन कंपनियों के पक्ष में लेटर ऑफ क्रेडिट खुलवाए किसी भी वितरण कंपनी को बिजली न दी जाए।
तैयार करना पड़ सकता है नया शिड्यूल
सूत्रों का कहना है कि अगर सरकार बिजली कंपनियों को अतिरिक्त राशि देने से हाथ खड़े कर देती है तो आपूर्ति का नया शेड्यूल तैयार करना पड़ सकता है। फिलहाल पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन केंद्र के ताजा आदेश से पैदा हुई स्थितियों पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करा रहा है। इसे जल्द ही मुख्यमंत्री और ऊर्जा मंत्री के सामने रखकर आपूर्ति व्यवस्था बनाए रखने के लिए मदद का अनुरोध किया जाएगा।
श्रेणी आपूर्ति शिड्यूल
- ग्रामीण 18 घंटे
- तहसील 24 घंटे
- जिला मुख्यालय 24 घंटे
- मंडल मुख्यालय 24 घंटे
- बुंदेलखंड 24 घंटे
- महानगर 24 घंटे
- उद्योग 24 घंटे
बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति ऐसी नहीं है कि बिजली खरीदने के लिए एडवांस में पैसा जमा कर सकें। आमदनी बढ़ाने के हर संभव उपाय किए जा रहे हैं। अभी सामने जो चुनौती है उससे निपटने के लिए हम मुख्यमंत्री और ऊर्जा मंत्री के पास जाकर पूरी स्थिति बताएंगे और सरकार से सहायता मांगेंगे। हर महीने आमदनी और खर्च में करीब 900 करोड़ का अंतर है। अगर इसकी भरपाई हो जाए तो बिजली का इंतजाम करने में दिक्कत नहीं होगी।
-आलोक कुमार, प्रमुख सचिव ऊर्जा व अध्यक्ष पावर कॉर्पोरेशन