मिजोरम के नतीजों का उदाहरण देकर कहा जा रहा है कि भाजपा विरोधी हवा उतनी तेज नहीं है जितनी कांग्रेस विरोधी। कांग्रेस जितना पीछे गई थी भाजपा उतना नहीं गई है। खासतौर से राजस्थान में। एक बार भाजपा तो दूसरी बार कांग्रेस की सरकार के चलन वाले राज्य में पिछली बार कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई थी। लेकिन इन तर्कों का कितना असर होगा, यह कहना मुश्किल है।
कठिन हुआ राहुल व कांग्रेस को नकारना
तीन हिंदी भाषी राज्यों के नतीजे कांग्रेसियों का मनोबल बढ़ाने के साथ इनके समर्थकों का भी उत्साह बढ़ाएंगे। भाजपा से नाराज और सपा व बसपा को वोट न देने वाले वोटर कांग्रेस के साथ आ सकते हैं जो अब तक पीएम मोदी की तुलना में राहुल का चेहरा कम जादुई मानकर कांग्रेस से दूरी बनाए थे। विपक्ष को यह कहने का आधार मिल गया कि ‘भाजपा या नरेंद्र मोदी अजेय नहीं हैं।’ इससे भाजपा की चुनौती बढ़ेगी।
सपा-बसपा के लिए कांग्रेस की अनदेखी आसान नहीं रह गई है। भाजपा रायबरेली और अमेठी पर झंडा फहराने की रणनीति बनाती चली आ रही है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी अमेठी में सक्रिय हैं तो केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने रायबरेली को नोडल जिला बनाकर यहां के समीकरण साधने की कोशिश की है। पीएम मोदी इसी 16 दिसंबर को रायबरेली आ रहे हैं। लेकिन ताजा नतीजों ने भाजपा का सपना पूरा होने में मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
प्रदेश में सरकार से लेकर भाजपा संगठन तक में बदलाव सामने आ सकते हैं। सत्ता विरोधी लहर को देखते हुए लोकसभा चुनाव के पहले राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल कर कुछ चेहरों को हटाया या उनके पर कतरे जा सकते हैं तो कुछ नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है।
भाजपा सांसदों के टिकट भी बड़े पैमाने पर बदलने की उम्मीद है। राजनीतिक समीक्षक नतीजों की एक वजह एससी-एसटी एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण पर केंद्र सरकार के रुख से अगड़ों और पिछड़ों में उपजी नाराजगी को भी मान रहे हैं। नतीजों से साफ हो गया है कि अब भी भाजपा ने कुछ न सोचा तो लोकसभा चुनाव में भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
समीक्षकों का कहना है कि नतीजों से यूपी के संदर्भ में हालिया कई प्रसंगों और घटनाओं पर भाजपा नेतृत्व और प्रदेश सरकार को आत्ममंथन की सलाह मिल रही है। जो हालात हैं वे सिर्फ संयोग नहीं हैं। जिस समय इन राज्यों के नतीजे भाजपा विरोधी लहर का संदेश दे रहे थे ठीक उसी समय अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष सीबी पालीवाल ने त्यागपत्र देकर भाजपा सरकार की साख और रीति-नीति पर सवाल उठाने का मौका दे दिया।
अध्यक्ष ने त्यागपत्र का कारण अस्वस्थता बताया है, लेकिन लोग पूछ रहे हैं कि आज ही का दिन क्यों? पिछले दिनों उप्र. लोकसेवा आयोग के सदस्य प्रो. राजवंत राव और आज पालीवाल के इस्तीफे ने सरकार और संगठन की चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करने का मौका दे दिया है।
नौकरियों में भर्ती और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठना, किसान कर्जमाफी और किसानों के लिए अन्य कई योजनाएं चलाने के बावजूद किसानों की सार्वजनिक हो रही नाराजगी, किसानों के लिए शुरू की गई सरकारी योजनाओं में उजागर हो रहे घोटालों जैसे मुद्दों पर नाराजगी भी भाजपा को आत्ममंथन की सलाह दे रहे हैं।
पार्टी अब तक कार्यकर्ताओं को संगठन के काम में जुटाने में तो सफल रही, लेकिन समायोजन को लेकर कार्यकर्ताओं में जिस तरह नाराजगी दिख रही है, भाजपा के लिए इन नतीजों के बाद उस पर ध्यान देना लाजिमी हो गया है।
भाजपा को विश्लेषण करना होगा कि उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय और बिजली कनेक्शन सहित तमाम योजनाएं चलाने के बाद सामने आए ऐसे नतीजों को भी सामने रखकर प्रदेश में इनकी खामियों को दूर करने और पुलिस व नौकरशाही के रवैये को लेकर गंभीरता से सोचने की नसीहत जनता ने भाजपा को दे दी है। इसकी अनदेखी 2019 की राह को और मुश्किल बना सकती है।