परिवहन निगम की बसों में फर्जी टिकट पर लोगों को यात्रा करने वाले संविदा कर्मियों के गिरोह पर स्पेशल टास्क फोर्स का शिकंजा कसने लगा है। इसी कड़ी में एसटीएफ की टीम ने शुक्रवार को गिरोह के सरगना अशोक और सुरजीत समेत एक अन्य अमित उर्फ भोला को अलगीगढ़ के इगलास थाना क्षेत्र से धर दबोचा है।
फर्जी टिकट मामले में पहले हुई कार्रवाई के बाद से ही एसटीएफ अशोक व सुरजीत की तलाश में थी। इनकेपास से मोबाइल, आधार समेत कई कागजात बरामद किया गया है।
तीनों के गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए एसटीएफ के एसएसपी अभिषेक सिंह ने बताया कि इससे पहले भी अगस्त में रोडवेड बसों में संविदा पर तैनात 11 कंडक्टरों के खिलाफ इगलास थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।
उसी समय फर्जी टिकट बेचने के मामले में अशोक व सुरजीत का नाम भी सामने आया था। ये दोनों भी अलीगढ़ केबुद्धविहार डिपो में संविदा पर परिचालक हैं। अशोक इगलास थाने के नगला नेचला और सुरजीत व अमित असावर का रहने वाला है।
उन्होंने बताया कि अशोक रोजवेज में फर्जी टिकट केधंधे केगिरोह का मास्टर माइंड है। उन्होंने बताया की तीनों की गिरफ्तारी पुलिस उपाधीक्षक श्यामकांत के निर्देशन में गठित टीम के निरीक्षक हरीश वर्धन सिंह व उफ निरीक्षक मुनेश बाबू ने की है।
पुलिस द्वारा पूछताछ में अशोक ने गिरोह द्वारा फर्जी टिकट बेचने केधंधे का तरीका केबारे में कई अहम जानकारियां दी है। उसने बताया कि आगरा रीजन में मथुरा से अलीगढ़ रूट 14 और आगरा से अलीगढ़ रूट पर 16 बसों का संचालन ठेके पर किया जा रहा है। इनमें चालक व परिचालक संविदा पर रखे गए हैं।
इन बसों में यात्रियों को टिकट की फोटो कांपी दी जाती है वह भी मात्र 20-5 यात्रियों को यह टिकट दिया जाता है। जबकि इन बसों में एक तरफ से करीब 100 यात्री बैठते हैं। पूछताछ में अशोक ने पुलिस को यह भी बताया है कि फर्जी टिकट के धंधे में परिवहन निगम के एआरएम, टीएस, एटीआई, सीनियर फोरमैन, डीजल बाबू व टीइम कीपर तक शामिल थे।
अशोक ने बताया कि सभी बसों में तैनात संविदा वाले सभी कंडक्टरों ने एक गैंग बना लिया था और, जिसे कोड भाषा में ग्रुप नाम दिया गया था। ग्रुप द्वारा पढ़े-लिखे यात्रियों के लिए ‘ओके’ या ‘प्लेन पेपर’ नाम से गोपनीय कोड बनाया गया था। जिसका अर्थ होता था कि सही टिकट देना है।
जबकि वृद्ध अशिक्षित यात्रियों को फर्जी टिकट दिया जाता था। इसी तरह प्रतिदिन यात्रा करने वाले यात्रियों को बिना टिकट यात्रा कराया जाता था। बस में टिकट को लेकर आवाज उठाने वाले यात्रियों को डराने-धमकाने के लिए बकादे बाउंसर भी रहते थे। जिन्हे भी काली कमाई में हिस्सा दिया जाता था।