केस- 1: जौनपुर के मड़ियाहूं ब्लाक में गांव के बाहर बने नए आंगनबाड़ी केंद्र भवन में मुंबई से लौटे लोगों के रुकने की व्यवस्था कराई है। यहां उनके खाने पीने का पुख्ता इंतजाम है। यहां एक पूर्व प्रधान बतातीं हैं कि बाहर से आने वाले तमाम लोगों के पास रहने के लिए सिर्फ एक कमरा है। ऐसे में घर में रहेंगे तो परिवार के दूसरे सदस्यों को संक्रमण फैल सकता है। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी है कि लोगों का ख्याल रखें। वोट के सवाल पर कहती हैं कि हम अपना धर्म निभा रहे हैं, वोटर अपना निभाएंगे।
केस- 2: महोबा के श्रीनगर ब्लाक के जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे एक दावेदार ने अपने इलाकेमें एक निजी विद्यालय को क्वारंटीन सेंटर बनवाया है। उनका तर्क है कि राजनीति समाजसेवा का काम है। इसलिए गुजरात, मुंबई से लौटने वालों के रुकने का इंतजाम कराया है। जिन लोगों की तबीयत खराब होती है, उनके इलाज की भी व्यवस्था कराई गई है। वोट के सवाल पर कहते हैं कि हमेशा समाजसेवा में लगे रहे हैं। सेवा के दम पर ही अन्य उम्मीदवारों को मात दे रहे हैं।
गिरी विकास अध्ययन संस्थान के सीएस वर्मा बताते हैं कि चुनावी सीजन में वोटरों को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए हमेशा नए-नए प्रयोग होते हैं। कुछ प्रत्यक्ष रूप से होते हैं तो कुछ अप्रत्यक्ष रूप से। उम्मीदवारों द्वारा क्वारंटीन सेंटर बनाना और उनके लिए हर स्तर पर इंतजाम करना वोट बटोरने की एक रणनीति है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि क्वारंटीन सेंटर में रहने वाले संबंधित उम्मीदवार के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। उस उम्मीदवार को वोट भी कर सकते हैं जिनकी मेहमाननवाजी कुबूल कर रहे हैं।