पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, मुलायम व मायावती।
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साढ़े तीन दशक पहले जिस अयोध्या आंदोलन की नींव पड़ी, उसने निर्णायक घड़ी तक पहुंचते-पहुंचते बहुत कुछ बदल दिया। हालात बदल दिए और किरदार भी बदल गए। देश और दुनिया भर में चर्चित श्रीराम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद ने न सिर्फ लोगों का ध्यान अयोध्या की तरफ खींचा, बल्कि भौगोलिक रूप से अवध के इस छोटे नगर ने देश और दुनिया में बहुत कुछ बदल दिया।
मुख्य किरदारों में कई तो फैसले का सपना लिए दुनिया से चले गए। जो बचे, उनकी भूमिका और जुबान भी बदल गई। सारे प्रमुख मुद्दई भी दुनिया छोड़ गए। कांग्रेस जैसे जो दल तब अर्श पर थे, वे धड़ाम होकर फर्श पर आ गिरे। भाजपा और शिवसेना जैसे दल जो तब अपने अस्तित्व की जद्दोजहद में जुटे थे, उन्हें इस आंदोलन ने आसमान पर पहुंचा दिया।
80 के दशक तक हिंदुत्व की राजनीति करने वाले जनसंघ और शिवसेना जैसे जो दल कांग्रेस ही नहीं, उसके विरोधी दलों के लिए अछूत थे, बीच-बीच में कई बार सरकार बनाने में भाजपा व शिवसेना का सहयोग ले चुके थे। साढ़े तीन दशक पहले देश में कांग्रेस का विकल्प बनने की जद्दोजहद थी तो आज इस मामले के निर्णायक घड़ी तक पहुंचते-पहुंचते सियासी परिदृश्य में भाजपा का विकल्प बनने की जद्दोजहद है। अखिलेश वाजपेयी की रिपोर्ट...
80 के दशक का माहौल: मीनाक्षीपुरम् की घटना से संघ हुआ विचलित
केरल के मीनाक्षीपुरम की धर्मपरिवर्तन की घटना ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विचलित किया। उससे पहले 1979 में दोहरी सदस्यता के नाम पर जिस तरह जनसंघ को जनता पार्टी से अलग होना पड़ा था, उसको लेकर भी संघ परिवार में जबरदस्त मंथन चल रहा था। चारों तरफ धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जनसंघ और संघ निशाने पर थे।
उसी बीच, संघ परिवार की पहल पर 83 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और 84 में दिल्ली में साधु-संतों की बैठक कर अयोध्या, मथुरा और काशी की क्रमश: श्रीराम जन्मभूमि, मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि और वाराणसी के काशी-विश्वनाथ मंदिर की मुक्ति आंदोलन के अभियान के सहारे हिंदुत्व के वैचारिक अधिष्ठान पर बने जनसंघ जैसे दलों की सियासी जमीन बनाने की कोशिश शुरू हुई।
प्रदेश की सियासी धारा बदली, मुलायम हुए मुख्यमंत्री
सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव
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शुरू में तो कांग्रेस सहित अन्य सियासी दलों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। समय आगे बढ़ने के साथ जैसे-जैसे यह आंदोलन तेजी पकड़ने लगा तो कांग्रेस सहित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनीति करने वाले दलों के कान खड़े होने लगे। इस दौरान जनसंघ का नामकरण भाजपा हो गया।
श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति के लिए निकली रथयात्राओं, शिलान्यास और अन्य अभियानों ने प्रदेश में सियासी परिदृश्य बदलना शुरू कर दिया। इसी बीच, वर्ष 1989 में देश में बोफोर्स तोप घोटाले को लेकर कांग्रेस के खिलाफ विश्वनाथ प्रताप सिंह की ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ मुहिम ने देश और प्रदेश में एक बार फिर कांग्रेस विरोधी दलों को संघ के वैचारिक अधिष्ठान पर काम करने वाले राजनीतिक दल भाजपा का साथ लेने को मजबूर किया।
केंद्र और प्रदेश में कांग्रेस को बेदखल कर भाजपा के समर्थन से जनता दल ने सरकार बनाई। प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे नारायण दत्त तिवारी। कांग्रेस पराजित हुई तो भाजपा के समर्थन से प्रदेश में मुलायम के नेतृत्व में सरकार बनी।
खत्म नहीं हो रहा कांग्रेस का वनवास
सोनिया गांधी (फाइल फोटो)
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श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के दौरान प्रदेश में कांग्रेस की तत्कालीन सरकारों में ताला खुलने, शिलापूजन और शिलान्यास जैसे घटनाक्रम के चलते बने माहौल के कारण ऐसा हुआ या बोफोर्स घोटाले के कारण, पर कांग्रेस की 1989 में प्रदेश की सत्ता से जो विदाई हुई तो आज तक वह सत्ता में लौटना दूर, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने को मजबूर है।
मुलायम मुख्यमंत्री बने, लेकिन श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का अभियान जारी रहा और 30 अक्तूबर 1990 को कारसेवा आंदोलन की घोषणा हो गई। अखाड़े में धोबी पाट दांव के लिए मशहूर रहे तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अयोध्या में परिंदे को पर न मारने देने की घोषणा करके सियासी अखाड़े में भी बड़ा दांव चला।
तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंदिर आंदोलन से बड़ी संख्या में जुड़ रहे हिंदुओं की ताकत की सियासी काट के लिए पिछड़ों को आरक्षण देने पर मुहर लगाई। मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर संघ परिवार के हिंदुत्व के ध्रुवीकरण से पिछड़ी जातियों को अलग करने की कोशिश की। सिंह को सियासी लाभ मिला या नहीं मिला, लेकिन मुलायम उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों के खासतौर से 8 प्रतिशत आबादी वाले यादवों के नेता बनने में सफल हो गए।
कारसेवा को सख्ती से रोकने के इंतजाम करके उन्होंने मुस्लिमों का समर्थन भी हासिल कर लिया। भाजपा ने केंद्र सरकार व प्रदेश की मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया तो कांग्रेस ने प्रदेश में उन्हीं को समर्थन दे दिया, जिन्होंने कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सत्ता हासिल की थी।
छह-छह महीने के मुख्यमंत्री का प्रयोग
बसपा सुप्रीमो मायावती
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भाजपा और बसपा का साथ भी लंबा नहीं चला, क्योंकि संघ परिवार अयोध्या आंदोलन पर लगातार आगे बढ़ रहा था। उधर, मायावती की आंखों में भी मुस्लिमों को साथ लेकर प्रदेश में लगभग 21 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी का समर्थन हासिल कर सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखने का सपना तैरने लगा था।
मायावती की तरफ से हिंदुत्व की राजनीति पर प्रहार होने लगे तो भाजपा व मायावती में भी अलगाव हो गया। वर्ष 1996 में विधानसभा के चुनाव हुए। भाजपा को रोकने के लिए धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस बार बसपा और कांग्रेस मिलकर लड़ीं। पर, सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलीं। गेस्ट हाउस कांड के चलते सपा और बसपा के एक होने की उम्मीद नहीं थी।
नतीजे आने के 6 माह बाद सरकार बनने की नौबत आई और भाजपा व बसपा के बीच 6-6 माह के सीएम पर समझौता हुआ। मायावती सीएम बनीं, लेकिन उनकी आंखों में अनुसूचित जाति व मुस्लिम गठजोड़ से सियासी ताकत मजबूत करने का सपना तैर रहा था।
छह महीने बाद मायावती ने भाजपा को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने से इन्कार कर दिया तो भाजपा ने बसपा और कांग्रेस तोड़कर निकले विधायकों के साथ प्रदेश में सरकार बना ली। केंद्र में भी अटल के नेतृत्व में भाजपा की 13 दिन की सरकार बनी। इसके बाद की कहानी अलग है, जिसमें कल्याण दो बार भाजपा से बाहर गए और फिर वापस आए। रामप्रकाश गुप्त और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बने। उधर, केंद्र में अटल के नेतृत्व में 13 दिन के बाद 13 महीने की भी सरकार बनी और फिर 1999 में अटल के ही नेतृत्व में पांच साल चलने वाली सरकार बनी।
कल्याण सिंह की बनी सरकार और गठबंधन का दौर
भाजपा नेता कल्याण सिंह।
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अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चल गई। मुलायम एक तरह से हिंदुओं के खलनायक बनकर उभरे। उन्होंने इसका लाभ उठाया और मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू कर दी। समीकरण बदले और आखिरकार मुलायम सिंह को 4 अप्रैल 1991 को त्यागपत्र देना पड़ा। जो भाजपा अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी, उसी ने प्रदेश में हिंदुत्व के मंदिर आंदोलन की किश्ती पर सवार होकर कल्याण सिंह के नेतृत्व में पूर्ण बहमत की सरकार बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। केंद्र में भी भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई।
अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ से सांसद बनकर नेता प्रतिपक्ष बने। मुलायम की पार्टी और कांग्रेस को अपेक्षित सीटें नहीं मिलीं। हालांकि मुस्लिम और यादवों के समर्थन के चलते मुलायम सिंह की पार्टी कांग्रेस से ज्यादा सीटें ले आई। पर, मंदिर आंदोलन आगे बढ़ता रहा और 6 दिसंबर 1992 को ढांचा ढहा दिया गया। कल्याण सरकार भी बर्खास्त हो गई और प्रदेश में फिर गठबंधनों का दौर शुरू हो गया।
मुलायम सिंह ने मुस्लिम और यादव वोट बैंक की ताकत के भरोसे समाजवादी पार्टी का गठन कर नए सियासी सफर की तरफ कदम बढ़ाया। वर्ष 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा का रास्ता रोकने के लिए सपा और बसपा ने गठबंधन किया।
सपा और बसपा से ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कांग्रेस फिर सपा और बसपा गठबंधन के समर्थन में खड़ी हुई और भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। पर, अहं के टकराव ने गेस्ट हाउस कांड को जन्म दिया और राजनीति फिर बदली। संघ के बृहद हिंदुत्व एकीकरण की कल्पना के तर्कों पर भाजपा ने मायावती को समर्थन देकर मुलायम को सत्ता से बाहर बैठने को मजबूर कर दिया।
भाजपा के समर्थन से मायावती तीसरी बार सीएम
बसपा सुप्रीमो मायावती।
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वर्ष 2002 में प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए तो मुस्लिम ध्रुवीकरण और पिछड़ों व अनुसूचित जाति के लोगों को जोड़ने की जीतोड़ कोशिश के बावजूद न मायावती को पर्याप्त सीटें मिलीं और न मुलायम को। कांग्रेस की संख्या कुछ करने लायक नहीं रही। एक बार फिर भाजपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी। इस बार हिंदुत्व और मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते गठबंधन टूटा और मुलायम के नेतृत्व में सरकार बनी। इसके बाद की कहानी अलग है।
मंदिर मुद्दे पर भाजपा की असमंजस की नीति ने अब लोगों का हिंदुत्व के मुद्दे पर उससे मोह भंग कर दिया था। वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी से सिर्फ 10 सीटें मिल पाईं और कांग्रेस उभरती हुई दिखी। पर, 2007 में वह कुछ खास नहीं कर पाई। मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। भाजपा सौ के अंदर सिमट गई।
वर्ष 2009 में भी भाजपा को मंदिर पर गोलमोल जवाबों को खामियाजा भुगतना पड़ा और सिर्फ 10 सीटें ही मिलीं। इस बीच, हाईकोर्ट के फैसले ने संघ परिवार की उम्मीदों को जगाया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद 2012 में भी भाजपा को कोई लाभ नहीं मिला। इस बार तो विधानसभा में 50 से भी कम सीटें मिलीं।
प्रतीकों से हिंदुत्व को धार, सियासी नायक के रूप में उभरे नरेंद्र मोदी
नरेंद्र मोदी
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कुछ घटनाओं और 2002 में अयोध्या में शिलादान के बाद ट्रेन से लौट रहे रामसेवकों के डिब्बे को जलाने की घटना (गोधरा कांड) के चलते गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी हिंदुत्व के नए सियासी नायक के रूप में उभरने लगे थे।
संघ ने उन्हें केंद्र की राजनीति में लाकर नए प्रयोग शुरू किए। उन्होंने अयोध्या और राममंदिर की बात किए बिना नए प्रतीकों से फिर हिंदुत्व को परवान चढ़ाया। सरकार बनी तो इस दिशा में काम भी किए। लोगों का भरोसा बढ़ा और 2012 में 50 से नीचे चली गई भाजपा हिंदु्त्व के नए प्रतीकों से बिछाई गई बिसात पर 2017 में प्रदेश में अकेले दम पर 312 सीटों के साथ सत्ता में वापस आई।
गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाकर हिंदुत्व को और धार दे दी जो श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से प्रारंभ से ही जुड़ी रही। फैसला आ गया और वर्षों पुराने विवाद का देश की सर्वोच्च अदालत ने समाधान कर दिया। देश और प्रदेश की राजनीति अब आगे क्या करवट लेगी, यह भविष्य बताएगा।