लखनऊ। 'राह में खतरे हजारों हैं, मगर चलना भी है...' राजधानी की सड़कों पर यह पंक्ति रोज हकीकत बनकर सामने आती है। यहां ट्रैफिक का नियम सिर्फ लाल, पीली और हरी बत्ती ही नहीं तय करती, कई बार सड़क पर बेखौफ टहल रहे छुट्टा पशु भी वाहनों की रफ्तार तय करते हैं। सुबह हो, दोपहर या शाम, कुकरैल बंधा मुख्य मार्ग हो, गोमतीनगर विस्तार का जी-20 मार्ग, बंधा रोड, रिंग रोड, सीतापुर रोड, कैंट रोड, कानपुर रोड या फिर किसी मोहल्ले की गली... हर जगह लगभग एक जैसा मंजर है। कहीं सड़क के बीच गोवंश आराम से टहल रहे हैं, कहीं सांड़ अचानक वाहनों के सामने आ जाता है और कहीं मवेशियों का झुंड पूरी लेन पर कब्जा कर लेता है। नतीजा, हर कुछ मीटर पर ब्रेक लगते हैं और हर सफर हादसे की आशंका के साथ पूरा होता है।
शनिवार को अर्जुनगंज के सरसावा में सड़क पर घूम रहे एक छुट्टा गोवंश ने आठ वर्षीय बच्ची पर हमला कर उसे घायल कर दिया। बच्ची की चीख सुनकर आसपास के लोग दौड़े और किसी तरह उसे सांड़ के चंगुल से छुड़ाकर अस्पताल पहुंचाया। यह घटना अकेली नहीं है। शहर में आए दिन छुट्टा पशुओं की वजह से लोग चोटिल हो रहे हैं और सड़क हादसे हो रहे हैं, लेकिन ऐसे मामलों में पीड़ितों के लिए अलग से कोई मुआवजा व्यवस्था नहीं है।
एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों पर छुट्टा पशुओं से होने वाले हादसों को गंभीर मानते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को मुआवजा तंत्र विकसित करने, पशुओं को खुला छोड़ने वाले मालिकों की जवाबदेही तय करने, उनकी टैगिंग और डिजिटल रिकॉर्ड रखने के साथ आश्रय स्थलों तक पहुंचाने की प्रभावी व्यवस्था बनाने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने एक नई उम्मीद जरूर जगाई है, लेकिन राजधानी के लोगों की असली राहत उस दिन होगी, जब सड़क पर चलते समय उन्हें सिग्नल से ज्यादा छुट्टा पशुओं पर नजर रखने की मजबूरी नहीं रहेगी और हर सफर बेखौफ होकर तय किया जा सकेगा।
गोशालाओं में संरक्षित 32 हजार से अधिक गोवंश
यह हाल तब है, जब सड़कों पर छुट्टा घूम रहे गोवंशों के संरक्षण के लिए जिले में 85 गोशालाएं संचालित हैं, जिनमें 32400 गोवंश संरक्षित हैं। इनमें नगर निगम में चार, नगर पंचायतों में 10 और 71 गोशालाएं ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित हैं।
दावा, दिखावा अधिक... धरातल पर कम काम
राजधानी में नगर निगम समय-समय पर छुट्टा पशुओं को पकड़ने के अभियान चलाने का दावा करता है, लेकिन जमीनी तस्वीर इससे अलग नजर आती है। शहर के प्रमुख मार्गों से लेकर कॉलोनियों और मोहल्लों तक छुट्टा पशु बेखौफ घूमते दिखाई देते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे हों, दफ्तर की ओर भागते कर्मचारी, ई-रिक्शा चालक, बुजुर्ग या दोपहिया वाहन चालक, हर किसी को सड़क पर ट्रैफिक के साथ-साथ छुट्टा पशुओं की चाल पर भी नजर रखनी पड़ती है।
रात में बढ़ जाता खतरा
लखनऊ। शाम ढलने और रात गहराने के साथ यह खतरा और बढ़ जाता है, जब अंधेरे में अचानक सामने आए पशु बड़े हादसे की वजह बन जाते हैं।
Iनगर में क्षेत्र में छुट्टा पशुओं को पकड़ कर उन्हें गोशालाओं में संरक्षित करने की जिम्मेदारी नगर निगम व नगर पंचायतों की होती है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में छुट्टा घूमने वाले पशुओं को पकड़ कर गोशालाओं तक भेजने की जिम्मेदारी खंड विकास अधिकारी की होती है। पशु पालन विभाग बीमार, चोटिल पशुओं का इलाज करता है। गोशालाओं में समय-समय पर व्यवस्था भी देखता है। I
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- सुरेश कुमार, मुख्य पशु चिकित्साधिकारीI
लखनऊ की सड़कों पर घूमते आवारा पशु।
लखनऊ की सड़कों पर घूमते आवारा पशु।
लखनऊ की सड़कों पर घूमते आवारा पशु।