फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

यूपी का रण : अगर नतीजे एग्जिट पोल के आंकड़ों की तरह आए और योगी को फिर मिली सत्ता तो बदलेंगी कई धारणाएं

अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 09 Mar 2022 04:07 AM IST

सार

अधिकृत रूप से तो यह 10 मार्च को पता चलेगा कि भाजपा सरकार आएगी या अखिलेश यादव का भाग्य चमकेगा अथवा कांग्रेस व बसपा चमत्कार करेंगी, पर राजनीतिक गलियारों में तेजी से ये चर्चाएं गूंज रही हैं कि मिथकों को तोड़ रहे योगी क्या उत्तर प्रदेश की सियासत के अन्य धारणाओं को भी तोड़कर इतिहास रचने जा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
योगी आदित्यनाथ - फोटो : अमर उजाला

अंतिम चरण के मतदान के साथ ही योगी आदित्यनाथ सरकार के साथ सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का भविष्य ईवीएम में कैद हो गया। अधिकृत रूप से तो यह 10 मार्च को पता चलेगा कि भाजपा सरकार आएगी, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का भाग्य चमकेगा या फिर कांग्रेस व बसपा चमत्कार करेंगी, पर राजनीतिक गलियारों में तेजी से ये चर्चाएं गूंज रही हैं कि  मिथकों को तोड़ रहे योगी आदित्यनाथ क्या उत्तर प्रदेश की सियासत के अन्य धारणाओं को भी तोड़कर इतिहास रचने जा रहे हैं।

ये सवाल यूं ही नहीं है। अगर एग्जिट पोल के अनुमान सही होते हैं और भाजपा सत्ता में वापसी करती है, तो प्रदेश के अब तक के इतिहास में योगी ऐसे पहले मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हो जाएंगे जो उत्तर प्रदेश में किसी विधानसभा का निर्धारित पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर फिर अपने दल की सत्ता में वापसी कराएंगे। भाजपा नेतृत्व यदि उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाने का फैसला करता है, तो वे भाजपा के ऐसे पहले नेता हो जाएंगे जो लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे। साथ ही प्रदेश में एक विधानसभा के पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार सीएम पद की शपथ लेने वाले भी पहले व्यक्ति बन जाएंगे।



दूसरी बार शपथ तो ली, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए
प्रदेश में 1951-52 के बाद से अब तक डॉ. संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी ने लगातार दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ली, लेकिन इन्हें यह मौका दो अलग-अलग विधानसभाओं के लिए मिला। पं. गोविंद वल्लभ पंत को केंद्र में गृहमंत्री बनाने के बाद कांग्रेस हाईकमान ने 28 दिसंबर 1954 को डॉ. संपूर्णानंद को मुख्यमंत्री नियुक्त किया। वे 1957 के चुनाव तक मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 1957 में चुनाव हुए और कांग्रेस जीती। डॉ. संपूर्णानंद ने 10 अप्रैल 1957 को फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री तो बने, लेकिन अलग-अलग विधानसभा के लिए। पहली बार पंत जी के बाद बनाए गए और इस बार भी उन्हें पूरे पांच साल का कार्यकाल नहीं मिला। वे 6 दिसंबर 1960 तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और कांग्रेस ने कुछ कारणों से उनकी जगह चंद्रभानु गुप्त को मुख्यमंत्री बना दिया। इस तरह डॉ. संपूर्णानंद लगातार मुख्यमंत्री रहे तो पांच वर्ष से अधिक, लेकिन अलग-अलग विधानसभाओं के लिए।

चंद्रभानु गुप्त के साथ भी इतिहास दोहराया
चंद्रभानु गुप्त के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह संपूर्णानंद के बाद 1960 में मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1962 में चुनाव हो गए। कांग्रेस को बहुमत मिला और संपूर्णानंद की तरह ही उन्होंने भी लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पर, उन्हें भी दोनों बार पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला।  कांग्रेस ने सफलता हासिल की और उन्हें 14 मार्च 1962 को लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, लेकिन पांच साल से पहले ही उनकी जगह सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। सुचेता कृपलानी के मुख्यमंत्रित्वकाल में ही 1967 में चुनाव हुए, लेकिन कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। जोड़-तोड़ से सरकार बनी और चंद्रभानु गुप्त को तीसरी बार 14 मार्च 1967 को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। पर, इस बार भी गुप्त 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और चौधरी चरण सिंह के विद्रोह के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
 

विज्ञापन

योगी आदित्यनाथ - फोटो : अमर उजाला
अंतिम चरण के मतदान के साथ ही योगी आदित्यनाथ सरकार के साथ सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का भविष्य ईवीएम में कैद हो गया। अधिकृत रूप से तो यह 10 मार्च को पता चलेगा कि भाजपा सरकार आएगी, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का भाग्य चमकेगा या फिर कांग्रेस व बसपा चमत्कार करेंगी, पर राजनीतिक गलियारों में तेजी से ये चर्चाएं गूंज रही हैं कि  मिथकों को तोड़ रहे योगी आदित्यनाथ क्या उत्तर प्रदेश की सियासत के अन्य धारणाओं को भी तोड़कर इतिहास रचने जा रहे हैं।

ये सवाल यूं ही नहीं है। अगर एग्जिट पोल के अनुमान सही होते हैं और भाजपा सत्ता में वापसी करती है, तो प्रदेश के अब तक के इतिहास में योगी ऐसे पहले मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हो जाएंगे जो उत्तर प्रदेश में किसी विधानसभा का निर्धारित पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा कर फिर अपने दल की सत्ता में वापसी कराएंगे। भाजपा नेतृत्व यदि उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाने का फैसला करता है, तो वे भाजपा के ऐसे पहले नेता हो जाएंगे जो लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनेंगे। साथ ही प्रदेश में एक विधानसभा के पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार सीएम पद की शपथ लेने वाले भी पहले व्यक्ति बन जाएंगे।

दूसरी बार शपथ तो ली, लेकिन कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए
प्रदेश में 1951-52 के बाद से अब तक डॉ. संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी ने लगातार दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ली, लेकिन इन्हें यह मौका दो अलग-अलग विधानसभाओं के लिए मिला। पं. गोविंद वल्लभ पंत को केंद्र में गृहमंत्री बनाने के बाद कांग्रेस हाईकमान ने 28 दिसंबर 1954 को डॉ. संपूर्णानंद को मुख्यमंत्री नियुक्त किया। वे 1957 के चुनाव तक मुख्यमंत्री रहे। वर्ष 1957 में चुनाव हुए और कांग्रेस जीती। डॉ. संपूर्णानंद ने 10 अप्रैल 1957 को फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वे लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री तो बने, लेकिन अलग-अलग विधानसभा के लिए। पहली बार पंत जी के बाद बनाए गए और इस बार भी उन्हें पूरे पांच साल का कार्यकाल नहीं मिला। वे 6 दिसंबर 1960 तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और कांग्रेस ने कुछ कारणों से उनकी जगह चंद्रभानु गुप्त को मुख्यमंत्री बना दिया। इस तरह डॉ. संपूर्णानंद लगातार मुख्यमंत्री रहे तो पांच वर्ष से अधिक, लेकिन अलग-अलग विधानसभाओं के लिए।

चंद्रभानु गुप्त के साथ भी इतिहास दोहराया
चंद्रभानु गुप्त के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह संपूर्णानंद के बाद 1960 में मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1962 में चुनाव हो गए। कांग्रेस को बहुमत मिला और संपूर्णानंद की तरह ही उन्होंने भी लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पर, उन्हें भी दोनों बार पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला।  कांग्रेस ने सफलता हासिल की और उन्हें 14 मार्च 1962 को लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, लेकिन पांच साल से पहले ही उनकी जगह सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। सुचेता कृपलानी के मुख्यमंत्रित्वकाल में ही 1967 में चुनाव हुए, लेकिन कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला। जोड़-तोड़ से सरकार बनी और चंद्रभानु गुप्त को तीसरी बार 14 मार्च 1967 को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। पर, इस बार भी गुप्त 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और चौधरी चरण सिंह के विद्रोह के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
 

चौधरी चरण सिंह को भी नहीं मिला इतिहास बनाने का मौका

चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़ी और कांग्रेस के विद्रोही विधायकों के साथ जनसंघ तथा अन्य कुछ दलों के समर्थन से सरकार बनाई। लेकिन सरकार स्थिरता नहीं दे पाई और 25 फरवरी 1968 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया। वर्ष 1969 में फिर चुनाव हुए और चंद्रभानु गुप्त ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मतभेदों के कारण कांग्रेस का विभाजन हो गया। इसी बीच चंद्रभानु गुप्त का स्वास्थ्य गड़बड़ा गया। उनकी जगह चौधरी चरण सिंह ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की  शपथ ली। पर, इस बार भी वे कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। फिर त्रिभुवन नारायण सिंह को 18 अक्तूबर 1970 को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। उस समय गोरखपुर की मानीराम सीट से गोरखनाथ पीठ के तत्कालीन महंत अवेद्यनाथ विधायक थे। उन्होंने टीएन सिंह के लिए मानीराम सीट छोड़ी। टीएन सिंह संयुक्त विधायक दल के उम्मीदवार के तौर पर यहां से उपचुनाव लड़े, लेकिन उन्हें कांग्रेस के रामकृष्ण द्विवेदी ने पराजित कर दिया। उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी को भी लगातार दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का अवसर तो  मिला, लेकिन इन्हें भी बतौर मुख्यमंत्री विधानसभा का पूरा पांच साल का कार्यकाल नहीं मिला।

जारी रहे प्रयोग
अस्थिरता का दौर चलता रहा। कोई मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। अयोध्या आंदोलन और मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद प्रदेश में अस्थिरता का नया दौर शुरू हुआ। वर्ष 1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। वर्ष 1991 में पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में भाजपा की पहली बार  सरकार बनी। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। पर, 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर उस समय स्थित ढांचे के ध्वंस के बाद उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गई। राष्ट्रपति शासन लग गया। वर्ष 1993 में चुनाव हुए और मुलायम सिंह यादव ने बसपा के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई और दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पर, इस बार भी वे पांच साल कुर्सी पर नहीं रह पाए। मायावती से विवाद के बाद मुलायम की जगह भाजपा के समर्थन से मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन वे भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं।

जोड़-तोड़ की सरकारें
सरकारों के आने-जाने का दौर चलता रहा। भाजपा ने 1997 से 2002 तक की सरकार में एक के बाद एक तीन नेताओं-कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्त, राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। कोई पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया और न भाजपा को सत्ता में वापस ला पाया। वर्ष 2002 में राजनाथ के नेतृत्व में भाजपा चुनाव मैदान में उतरी लेकिन बहुमत नहीं मिला। सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भाजपा व बसपा ने तीसरी बार गठबंधन कर सरकार बनाई और मायावती तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं। पर,  इस बार भी सरकार पांच साल पूरा नहीं कर पाई और भाजपा के समर्थन वापस लेने से मायावती को सत्ता छोड़नी पड़ी। मुलायम सिंह तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। वह 2007 तक रहे, लेकिन इस बार भी चूंकि वह बीच में मुख्यमंत्री बने तो पांच साल का कार्यकाल नहीं मिल पाया।

स्थिरता का दौर लौटा
दलबदल, उठापटक और अस्थिरता से जनता ऊबी और उसने 1991 के बाद वर्ष 2007 में बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देकर डेढ़ दशक बाद पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। मायावती ने बतौर मुख्यमंत्री विधानसभा का निर्धारित कार्यकाल पूरा किया, लेकिन 2012 में हुए चुनाव में वह बसपा की सत्ता में वापसी नहीं करा पाईं। जनता ने 2012 में 224 सीटों के साथ बहुमत देकर सपा की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2017 में वह भी अपनी पार्टी की सत्ता में न वापसी करा पाए और न लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बन पाए।

...तो दूसरी बार शपथ लेने वाले पहले नेता होंगे

जनता ने 2017 में गठबंधन के साथियों के साथ भाजपा को 325 सीटें देकर प्रचंड बहुमत की सरकार बनाने का मौका दिया। योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। भाजपा ने उन्हें पूरे पांच साल मुख्यमंत्री बनाकर रखा। मतदान पूरा हो चुका है और अब 10 मार्च को नतीजों का इंतजार है। ऐसे में सबकी जिज्ञासा यही है कि तमाम मिथक तोड़ रहे योगी बतौर मुख्यमंत्री पांच साल चली भाजपा की सरकार की वापसी कराने में सफल होते हैं या नहीं।

अगर वह सफल होते हैं तो वे न सिर्फ 1985 के बाद ऐसे पहले मुख्यमंत्री होंगे जो अपनी पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता दिलाएंगे। उत्तर प्रदेश के इतिहास में ऐसे पहले मुख्यमंत्री और राजनेता होंगे जिनके नेतृत्व में विधानसभा का निर्धारित पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद कोई दल फिर सत्ता में वापसी करेगा। यदि वे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं तो लगातार पांच साल पूरा करने के बाद दूसरी बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले भी पहले नेता होंगे।

एक मिथक यह भी
ये सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रदेश में अब तक माना जाता रहा है कि नोएडा जाने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित नहीं रहती है। उसकी सत्ता में वापसी नहीं होती। इस कारण कुछ मुख्यमंत्री तो नोएडा जाने से बचते रहे। उद्घाटन या शिलान्यास को लेकर कुछ को कार्यक्रम के सिलसिले में वहां जाने की जरूरत पड़ी, तो नोएडा न जाकर अगल-बगल या दिल्ली के किसी स्थान से इस काम को पूरा किया। योगी ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो नोएडा जाने से डरने के बजाय वहां कई बार गए। उन्होंने नोएडा जाने के बाद भी लगातार पांच साल मुख्यमंत्री रहकर एक मिथक तो तोड़ दिया है, लेकिन अब देखना यह है कि वह दूसरा मिथक भी तोड़ पाते हैं या नहीं।

प्रो. एपी तिवारी बताते हैं, यूपी में 1988 से यह  मिथक है कि नोएडा जाने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी चली जाती है। वीर बहादुर सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे नोएडा गए और संयोग से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई।  नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। वे 1989 में नोएडा के सेक्टर-12 में नेहरू पार्क का उद्घाटन करने गए। कुछ समय बाद चुनाव हुए, लेकिन वे कांग्रेस की सरकार में वापसी नहीं करा पाए। इसके बाद कल्याण सिंह और मुलायम सिंह यादव के साथ भी ऐसा ही हुआ कि वे नोएडा गए और कुछ दिन बाद संयोग से मुख्यमंत्री पद छिन गया। राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे तो उन्हें नोएडा में निर्मित एक फ्लाईओवर का उद्घाटन करना था। पर, उन्होंने नोएडा की जगह   दिल्ली से उद्घाटन किया।

इस पर भी रहेगी नजर
प्रदेश 2007 में पूर्ण बहुमत की सरकारों के युग की वापसी के योगी समेत सभी मुख्यमंत्री विधान परिषद के सदस्य रहे हैं। योगी ऐसे पहले नेता हैं जो बीते डेढ़ दशक में बतौर मुख्यमंत्री विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। संयोग यह भी है कि वह विधानसभा का पहला चुनाव लड़ रहे हैं तो यह देखना भी दिलचस्प होगा कि बतौर मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह को हरा देने वाले गोरखपुर का मुख्यमंत्री को पटखनी देने का मिथक किस तरह टूटता है। विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी विधानसभा का पहला चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में यह भी देखना दिलचस्प होगा कि वर्तमान और पूर्व मुख्यमंत्री में किसका आंकड़ा कहां आकर ठहरता है।

कांग्रेस ने किसी मुख्यमंत्री को पूरा नहीं करने दिया कार्यकाल
प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मिलाकर 21 लोगों को मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य मिला। इनमें 13 कांग्रेस के नेता हैं। पर, संयोग देखें कि कांग्रेस के किसी भी नेता को बतौर मुख्यमंत्री विधानसभा का निर्धारित कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला। कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने किसी को टिकने नहीं दिया। जनता ने तो कांग्रेस को मौका दिया, लेकिन उसने किसी नेता को बतौर मुख्यमंत्री विधानसभा का पूरे पांच साल का कार्यकाल नहीं दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next