लखनऊ। जो सुबह को रात और रात को सांझ कह रहे हैं... तलवार हवाओं के लिए भांज रहे हैं... प्रेशर में जिनके रहता है पूरा महकमा, वह घर की रसोई में कुकर मांज रहे हैं। व्यंग्यकार मानक मुकेश ने जब लाइनें पढ़ीं तो दर्शक ताली बजाने को मजबूर हो गए। मौका था सोमवार को डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की ओर से आयोजित समाज और साहित्य विमर्श, संवेदना, दिव्यांगता पुनर्वास व सामाजिक दायित्व विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का।
कवि पंकज प्रसून ने महंगाई पर कहा, पेट्रोल पंप पर मेरी टंकी जो फुल हुई, ऐसा लगा कि जख्म पुराना हो सिल गया... तिजोरी से भी ज्यादा, अब हिफाजत इसकी करनी है, सिलिंडर क्या मिला, जैसे कि खजाना हो मिल गया...। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि कालीचरण स्नेही की मौजूदगी में शिखा श्रीवास्तव व अशोक झंझटी ने काव्यपाठ किया।उद्घाटन सत्र का संचालन हिंदी विभागाध्यक्ष व कार्यक्रम संयोजन प्रो. यशवंत वीरोदय ने किया। मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के राज्य दिव्यांगजन आयुक्त प्रो. हिमांशु शेखर झा रहे।
अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विद्वानों ने व्याख्यान दिए। शोधकर्ताओं ने शोध पत्रों की प्रस्तुतियां दी। इनमें न्यू जर्सी अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति न्यू जर्सी चैप्टर के अध्यक्ष रामबाबू गौतम, नॉर्वे से आए भारतीय-नॉर्वेजियन सूचना व सांस्कृतिक फोरम के अध्यक्ष डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ व थाइलैंड के चार शोधकर्ता शामिल रहे। युवा शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए विशेष अकादमिक सत्र हुए। प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र दिए गए।