मंच पर उतरी कलयुगी सुदामा की कहानी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान और रंगयात्रा संस्था की ओर से गोमतीनगर के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संस्थान में मंगलवार शाम संस्कृत अनुवादित नाट्य कृति कलयुगी सुदामा का मंचन किया गया। इसे लिखा वरिष्ठ रंगकर्मी चित्रा मोहन ने और निर्देशन किया ज्ञानेश्वर मिश्र ज्ञानी ने। नाटक की पृष्ठभूमि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता पर आधारित पौराणिक कथा से ली गई जिसे वर्तमान संदर्भ में मंच पर उतारा गया।
पौराणिक कथा के अनुसार, जब सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने जाते हैं तो श्रीकृष्ण उनकी पोटली के चावल की दो मुट्ठी खाकर उन्हें दो लोक का राज दे देते हैं। नाटक में इसे कलयुग के परिवेश में दिखाने का प्रयास किया गया। नाटक में दिखाया गया कि श्रीकृष्ण सुदामा की खातिरदारी कर उन्हें विदा कर देते हैं। सुदामा सोचते हैं कि श्रीकृष्ण ने उन्हें कुछ नहीं दिया लेकिन घर पहुंचने पर उनको अपनी कुटिया के स्थान पर महल दिखता है। तब उनकी पत्नी उन्हें बतलाती हैं कि तुम्हारे जाने के बाद यह सारा वैभव हमें श्रीकृष्ण ने ही आकर हमें दिया है। इस पर सुदामा अपनी पत्नी पर संदेह करते हैं और उन्हें डांटते हैं। तब श्रीकृष्ण आकर उन पर पड़ी माया का पर्दा हटाते हैं। रास नृत्य के साथ नाटक संपन्न होता है।
नाट्य प्रस्तुति में पारंपरिक आरती, प्रचलित लोक गीत और कवि नरोत्तम दास के छंदों का इस्तेमाल किया गया। मंच पर गुरुदत्त पांडेय, उज्ज्वल सिंह, मुकुल चौहान, संकल्प शुक्ल, प्रेम कुमार, अंशिका सक्सेना, लता बाजपेई, सुरुचि सक्सेना और निरुपमा राहुल ने अभिनय किया।
मंच पर उतरी कलयुगी सुदामा की कहानी
मंच पर उतरी कलयुगी सुदामा की कहानी
मंच पर उतरी कलयुगी सुदामा की कहानी
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