इलाहाबाद विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई करने वाले हुकुम सिंह का 1962 में पीसीएस (जे) में चयन हो गया था। नौकरी जॉइन करने की सारी औपचारिकताएं हो चुकी थीं, पर एक शाम रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की युवाओं से देश की सेवा के लिए आगे आने की अपील और आह्वान ‘देश के लिए युवा अच्छी नौकरी का मोह छोड़ें’ सुनकर उन्होंने सेना में कमीशंड ऑफिसर का फॉर्म भर दिया और उनका चयन हो गया। वर्ष 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई में वे बतौर कैप्टन राजौरी बॉर्डर पर तैनात रहे। वर्ष 1969 में सेना की नौकरी छोड़ लौट आए और मुजफ्फरनगर में वकालत करने लगे।
भाजपा में कई दायित्व संभालने वाले हुकुम सिंह को राजनाथ सिंह ने अपने मुख्यमंत्री काल में अति पिछड़ों की लामबंदी के अभियान को अमली जामा पहनाने की जिम्मेदारी सौंपी।
उन्होंने गुर्जर समाज से आने वाले इस कद्दावर पिछड़े नेता की अध्यक्षता में सामाजिक न्याय समिति गठित की। हुकुम सिंह ने पिछड़ी और दलित जातियों में उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण के बंटवारे का फॉर्मूला दिया।
राजनाथ सरकार ने इसे लागू कर दिया, पर बाद में कुछ कारणों से उस पर आगे अमल नहीं हो पाया। कैराना सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पलायन के मुद्दे को प्रमुखता से उठाने को लेकर भी हुकुम सिंह काफी चर्चा में रहे। कुछ वर्षों पहले राजधानी लखनऊ में उनकी पत्नी की हत्या हो गई थी। उसके बाद से वे काफी दुखी रहा करते थे।