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Lucknow News: कुषाण काल की मूर्तियां बता रहीं महात्मा बुद्ध से विदेशी शासक भी थे प्रभावित

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सतीश संगम, लखनऊ। महात्मा बुद्ध के शांति के उपदेश व उनकी जीवन शैली की छाप हर शासनकाल में मिलती है। न केवल देश बल्कि विदेशी शासकों ने भी बुद्ध को अपनाया और उनके विचारों से प्रभावित होकर मूर्तियां बनवाईं। यही वजह है कि पुरातत्व की खोदाई में कुषाण काल से भी पहले की बुद्ध की मूर्तियां मिली हैं। उत्तर प्रदेश राज्य संग्रहालय में 2000 साल पहले की गौतम बुद्ध की करीब 150 मूर्तियां संरक्षित की गई हैं।
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राज्य संग्रहालय की सहायक निदेशक मीनाक्षी खेमका ने बताया कि अलग-अलग कालखंड की मिली मूर्तियों से यह पता चलता है कि उस दौर में गौतम बुद्ध हर सभ्यताओं पर प्रभावशाली रहे। मथुरा, श्रावस्ती, महोबा, नालंदा बिहार, कुशीनगर, वाराणसी, अयोध्या व अन्य क्षेत्रों की खोदाई व अन्य माध्यम से मिली मूर्तियां सदी से भी पहले की संस्कृति को दर्शाती हैं।
आर्ट गैलरी की प्रभारी अनिता चौरसिया ने बताया कि बुद्ध के जीवन संघर्ष व उनके उपदेश को मूर्तियों के जरिये दर्शाया गया है। ईरानी-यूनानी आक्रमण के दौरान बनी मूर्तियों में विदेशी कला व संस्कृति की झलक नजर आती है। जातक कथा, बुद्ध के उपदेश के साथ ही वज्रपाणि कुषाण काल की गांधार कला की भी छाप नजर आती है। इसके अलावा मगध, गुप्त काल व सारनाथ में धम्म चक्र को भी प्रदर्शित किया गया है। (संवाद)
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बलुआ पत्थर से निर्मित बुद्ध की प्रतिमा में धम्म चक्र का है अंकन
गौतम बुद्ध की मूर्तियों में कुषाण काल, मथुरा, गुप्त कालीन सारनाथ शैली की विशेषताएं मिलती हैं। बलुआ पत्थर से निर्मित बुद्ध की प्रतिमा में धम्म चक्र का अंकन है। चक्र के दोनों ओर एक-एक ध्यानस्थ पुरुष की आकृतियां उत्कीर्ण हैं। इतिहासकारों के अनुसार, भगवान बुद्ध की मूर्ति की स्थापना बुद्ध मित्र नाम के भिक्षु के जरिये संभवत गुप्त शासन काल के समय की गई थी।
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गुप्त काल में मथुरा व सारनाथ थे कला के प्रमुख केंद्र
यश बिहार मथुरा से 1600 साल पहले की गौतम बुद्ध की प्रतिमा मिली है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित बुद्ध की मूर्तियों में गुप्त काल का संकेत मिलता है। इस काल में उत्तर भारतीय कला केंद्रों में मथुरा और सारनाथ प्रमुख कला केंद्र थे। शुरुआत में मथुरा केंद्र की मूर्तियां कुषाण शैली पर ही निर्मित हुईं,। लेकिन, आगे चलकर मथुरा केंद्र भी गुप्त शैली से प्रभावित हो गया।
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