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Lucknow News: लोकगीतों में उभरा पलायन का दर्द, पिया परदेसी ने मोहा मन

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लोकगीतों में उभरा पलायन का दर्द, पिया परदेसी ने मोहा मन
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लखनऊ। पारंपरिक लोकगीतों और बिदेसिया शैली के जरिये पलायन का दर्द बुधवार को मंच पर जीवंत हुआ। गोमती नगर स्थित बौद्ध शोध संस्थान में मंजुश्री लखनऊ की ओर से प्रस्तुत नाटक ‘पिया परदेसी’ में परिवार, पलायन और गांव से जुड़ाव की कहानी ने दर्शकों को प्रभावित किया। ‘आंख में सपना, पेट में ललना’ और ‘केहू मोरा तन लूटे, केहू मोरा मन लूटे’ जैसे लोकगीत प्रस्तुति का खास आकर्षण रहे।
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आशुतोष मिश्रा लिखित और शैलेश श्रीवास्तव निर्देशित नाटक में बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि दिखाई गई। राघव पत्नी जानकी की इच्छा के बावजूद कमाई के लिए मुंबई जाता है और अभिनेत्री कैटरीना के मोह में पत्नी को पहचानने से भी इन्कार कर देता है। निराश जानकी गांव लौटती है, जहां महादेव राय उसका शोषण करता है। जानकी साहस के साथ उसका सामना करती है। बाद में राघव भी गांव लौटता है और जानकी से कहता है कि वह उसके अपराध का दोष अपने ऊपर ले लेगा। जानकी उसे ऐसा करने से रोकते हुए गांव में ही रोजगार के अवसर बनाने का संदेश देती है।
आयोजन में अजयश्री की विशेष भूमिका रही। सोनिका पाल, करुणा शंकर उपाध्याय, सुधेश शर्मा और रुचिता जायसवाल ने प्रमुख भूमिकाओं में प्रभाव छोड़ा। निशांत पांडेय, स्नेहा शुक्ला, कुंदन पाठक, उपेंद्र द्विवेदी और हिमांशु मिश्रा का संगीत भी प्रस्तुति का मजबूत पक्ष रहा।
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