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हाईकोर्ट की लताड़ के बाद बच्ची को मिला इलाज

Sat, 12 Apr 2014 02:51 AM IST
मनोज कुमार सिंह/ अमर उजाला, लखनऊ
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साढ़े तीन साल की अबोध बीमार बच्ची के गरीब पिता को केजीएमयू की कार्यशैली से परेशान होकर बच्ची के इलाज के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी।
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यह बालिका पोलियो पक्षाघात से पीड़ित है। इसके लिए उसे करीब 14,000 कीमत वाले इंजेक्शन की तुरंत जरूरत है। पिता का नाम तो इंटरनेट पर उपलब्ध बीपीएल सूची में है लेकिन प्रशासनिक लापरवाही से उसके नाम का बीपीएल कार्ड जारी नहीं हो सका।

सूची में उसका नाम होने के बावजूद अस्पताल व दफ्तर उसके परिवार के गरीब होने का सबूत नहीं माना। बच्ची के पिता को बीपीएल कार्ड पेश करने को कहा गया। कोर्ट ने इसे पूरी तरह मनमाना और अतर्क संगत करार दिया।
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साथ ही केजीएमयू से संबद्ध अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों को निर्देश दिया कि बच्ची को इंजेक्शन समेत अन्य सभी जरूरी इलाज बिना बीपीएल कार्ड की मांग के तुरंत मुहैया कराया जाए।

जस्टिस सुनील अंबवानी और जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की खंडपीठ ने यह आदेश बच्ची की तरफ से पिता दीपक कुमार यादव की याचिका पर दिया।

याची के अधिवक्ता राजबख्श सिंह के मुताबिक फैजाबाद के मसौधा ब्लॉक निवासी बच्ची के पिता का नाम बीपीएल सूची में है। लेकिन अभी उसे बीपीएल कार्ड नहीं मिला है।

बच्ची को इलाज के लिए आईवीआईजी 5 जीएम 5 वॉयल्स नामक करीब 14,000 की कीमत वाले इंजेक्शन की तत्काल जरूरत पड़ी। इसका ब्यौरा बच्ची के इलाज के कार्ड में दर्ज है।

लेकिन बीपीएल राशन कार्ड पेश न किए जाने पर अस्पताल का दफ्तर उसके परिवार के गरीब होने का सबूत नहीं मान रहा है। यह बच्ची पीडियाट्रिक वार्ड-दो में भर्ती है।

याची ने बच्ची का मुफ्त इलाज न होने पर हाईकोर्ट में गुहार की थी। अदालत ने याची से बीपीएल राशन कार्ड मांगने पर जोर देने को पूरी तरह मनमाना और अतर्कसंगत करार दिया।

कोर्ट ने कहा कि याची ले ब्लाक मसौधा के बीपीएल परिवारों की सूची इंटरनेट से डाउनलोड कर पेश की है। इसे बीपीएल कार्ड जारी होने के सबूत के तौर पर मान लिया जाना चाहिए।
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सूची से पता चलता है कि याची गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाला है और अस्पताल से अपनी बच्ची के लिए इंजेक्शन समेत मुफ्त इलाज का हकदार है। अदालत ने निर्देश के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया।
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