लखनऊ। गर्भावस्था में मधुमेह जांच के लिए प्रचलित दोनों तरीकों में कौन सा बेहतर है, इसकी बहस अब खत्म हो जाएगी। केजीएमयू के साथ ही देश के आठ प्रमुख केंद्रों पर 16 हजार से अधिक महिलाओं पर इसका विस्तृत अध्ययन शुरू हो गया है। साल के आखिर तक इसका परिणाम आ जाएगा।
केजीएमयू में स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रमुख प्रो. अंजू अग्रवाल ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज) महिला और उसके होने वाले बच्चे दोनों के लिए बेहद खतरनाक है। इस समय इसकी जांच की दो पद्धतियां प्रचलित हैं। पहली डिप्सी पद्धति कही जाती है, जिसमें खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती है। इसमें दो बार रक्त का सैंपल लिया जाता है। पहली बार बिना ग्लूकोज दिए और दूसरी बार ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद। भारत में यही पद्धति ज्यादा प्रचलित है।
वहीं, दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर आईएडीपीएसजी पद्धति प्रचलित है। इसमें खाली पेट खून में शर्करा की जांच की जाती है। इसके बाद भोजन करके खून का सैंपल लिया जाता है। आईएडीपीएसजी को विश्व स्वास्थ्य संगठन का समर्थन प्राप्त है। इस अध्ययन में 14 हजार से ज्यादा गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया है। अध्ययन के आधार पर तय किया जाएगा कि दोनों में कौन सी प्रणाली बेहतर है। सही समय पर और सही तरीके से जांच होने पर मां और बच्चे दोनों में जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।
यहां चल रहा अध्ययन
राजकीय मेडिकल कॉलेज औरंगाबाद महाराष्ट्र, मेडिकल कॉलेज एंड एसएसजी हॉस्पिटल वडोदरा, इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्स एंड गाइनी चेन्नई, असम मेडिकल कॉलेज डिब्रूगढ़, केजीएमयू, वीएमएमसी एंड सफदरजंग मेडिकल कॉलेज दिल्ली, एम्स रायपुर, एम्स नई दिल्ली
यह है गर्भकालीन मधुमेह
गर्भावस्था के दौरान पहली बार बढ़ी हुई रक्त शर्करा की स्थिति को गर्भकालीन मधुमेह कहा जाता है। इससे मां में उच्च रक्तचाप, समय से पहले प्रसव और सिजेरियन का खतरा बढ़ सकता है। नवजात में कम शर्करा, अधिक वजन, सांस संबंधी दिक्कत और अन्य जटिलताएं हो सकती हैं। इसीलिए विशेषज्ञ नियमित जांच, संतुलित भोजन और व्यायाम की सलाह देते हैं।
अध्ययन में इन बातों पर रहेगी नजर
समय से पहले प्रसव
नवजात का अधिक वजन
नवजात में शर्करा की कमी
गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप
पीलिया और सांस संबंधी परेशानी
प्रसव के दौरान जटिलताएं
प्रसव के बाद मां और बच्चे की सेहत