स्थानीय किसान पल्लू बताते हैं कि सभी ग्रामीणों ने बहुत पहले तय कर लिया था कि केले और गन्ने की खेती नहीं करेंगे। दरअसल, यह हाथी पसंद करते हैं। हालांकि, कुछ समय पहले एक-दो परिवारों ने खाने के लिए घर के बाहर केले के पेड़ लगाए तो हाथी गांव में आने लगे। फिर लोगों ने केले के पेड़ खुद ही हटा दिए। गन्ना तेंदुओं को जंगल जैसा लगता है।
किसान अरविंद बताते हैं कि हल्दी कोई भी वन्यजीव नहीं खाता। इसलिए हमने हल्दी को प्राथमिकता दी। भवानीपुर में सभी किसान तैयार हल्दी की खोदाई कर रहे है। यहां गेहूं, मक्का, अरहर और सरसों उगाते हैं। खाने भर का अनाज खेत में पैदा कर लेते हैं। भोजन पकाने के लिए लकड़ी जंगल से मिल जाती है। आवास, शौचालय, राशन और पेंशन सरकार से मिल रही हैं।
हुकुम अली बताते हैं कि हाथी गांव के नजदीक से गुजरते हैं लेकिन कभी नुकसान नहीं पहुंचाते। दिसंबर की एक सर्द रात हाथियों ने जंगल से सटी एक झोपड़ी जरूर गिरा दी थी लेकिन ग्रामीणों के जागने और शोर मचाने पर चले गए। हमारी कई पीढ़ियों ने जंगली जानवरों के व्यवहार को परखा है। इन जानवरों से बचने की कला हम अच्छी तरह सीख चुके हैं।