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थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज में आर्थिक संकट नहीं आएगा आड़े, मिलेंगे दो करोड़

Thu, 06 Dec 2018 03:49 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : डेमो
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थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज में अब आर्थिक संकट आड़े नहीं आएगा। इसके  लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और कोल इंडिया के बीच समझौता हुआ है। बुधवार को चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन की मौजूदगी में इस एमओयू पर हस्ताक्षर हुए।

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इसके तहत थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को बोनमैरो प्रत्यारोपण के लिए कोल इंडिया दो करोड़ की मदद करेगा। इससे 20 बच्चों का इलाज किया जाएगा। एसजीपीजीआई में आयोजित समारोह में चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने भी भरोसा दिलाया कि थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए प्रदेश सरकार सभी प्रयास करेगी।

आर्थिक तंगी से किसी बच्चे का इलाज प्रभावित नहीं होगा। एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. राकेश कपूर ने कहा कि कोल इंडिया ने पूरे भारत में छह चिकित्सा संस्थानों को मदद के लिए चुना है। उसमें यूपी में एसजीपीजीआई का चयन किया है।
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इस दौरान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की सलाहकार विनीता श्रीवास्तव, महानिदेशक डॉ. केके गुप्ता, कोल इंडिया के प्रबंधक एके पांडेय, सीएमएस प्रो. अमित अग्रवाल, प्रो. अनुपम वर्मा, डॉ. आर कश्यप, केजीएमयू के प्रो. एके त्रिपाठी मौजूद रहे। दूसरे सेशन में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के परिवारीजनों को बीमारी से पहचानने और उसके निदान के बारे में जानकारी दी गई। 

एक बोनमैरो प्रत्यारोपण में 10 लाख का खर्च

इलाज के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर के दौरान मौजूद चिकित्सा शिक्षा मंत्री - फोटो : amar ujala
हिमेटोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि एक बच्चे के बोनमैरो प्रत्यारोपण में करीब 10 लाख का खर्च आता है। एसजीपीजीआई में 90 बोनमैरो प्रत्यारोपण हो चुके हैं। सुविधा संपन्न परिवार के बच्चों में दिक्कत नहीं आती है, लेकिन गरीब परिवार के लिए बोन मैरो प्रत्यारोपण का खर्च उठाना संभव नहीं हो पाता है।

कोल इंडिया से मिली मदद के जरिए विभाग से पंजीकृत चार बच्चों का प्रत्यारोपण किया जाएगा, जबकि 16 बच्चों का बाद में किया जाएगा। उन्होंने बताया कि हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन।

थैलेसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। इससे लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। बार-बार रक्त चढ़ाने से मरीज के शरीर में जमा होने वाले लौह तत्व से हृदय, यकृत और फेफड़ों के लिए घातक हो जाता है। यही वजह है कि बोनमैरो प्रत्यारोपण को उपयुक्त माना गया है।
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क्या है थैलेसीमिया

चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन - फोटो : amar ujala
यह एक अनुवांशिक बीमारी है। बोनमैरो प्रत्यारोपण के जरिए इसका उपचार किया जा सकता है। इसके लिए बीमार बच्चे के बोनमैरो से उसके भाई या बहन का बोनमैरो का मिलान किया जाता है। मिलान होने के बाद बोनमैरो प्रत्यारोपण किया जाता है।

इस रोग के होने पर शरीर में हीमोग्लोबिन बनना बंद हो जाता है। यदि बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थैलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया हो सकता है। यदि मां या पिता किसी एक में माइनर थैलेसीमिया है तो बच्चे में 25 प्रतिशत संभावना है। ब्लड की जांच में कंपलीट ब्लड काउंट (सीबीसी), हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस, म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) द्वारा भी इसकी जांच होती है।

कैसे करें पहचान
इसकी पहचान बच्चे के तीन माह होने पर दिखने लगती है। रक्त की कमी होने से बच्चा बीमार रहने लगता है और उसे बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। मरीज का चेहरा सूखने लगता है। वह लगातार बीमार रहने लगता है। वजन घटने लगता है।
 
इस तरह बचें
यदि परिवार में किसी को थैलेसीमिया रहा है तो शादी से पहले महिला व पुरुष के ब्लड की जांच करा लें।
- गर्भ धारण करने के तीन माह का वक्त पूरा होने से भ्रूण की जांच करा लें।
- यदि एक बच्चे में थैलेसीमिया है तो माता-पिता दोनों जांच कराने के बाद दूसरे बच्चे के गर्भ में आते ही जांच कराएं। चिकित्सक की निगरानी में हर तीसरे माह जांच कराते रहें।
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