इलाज के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर के दौरान मौजूद चिकित्सा शिक्षा मंत्री
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हिमेटोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनिया नित्यानंद ने बताया कि एक बच्चे के बोनमैरो प्रत्यारोपण में करीब 10 लाख का खर्च आता है। एसजीपीजीआई में 90 बोनमैरो प्रत्यारोपण हो चुके हैं। सुविधा संपन्न परिवार के बच्चों में दिक्कत नहीं आती है, लेकिन गरीब परिवार के लिए बोन मैरो प्रत्यारोपण का खर्च उठाना संभव नहीं हो पाता है।
कोल इंडिया से मिली मदद के जरिए विभाग से पंजीकृत चार बच्चों का प्रत्यारोपण किया जाएगा, जबकि 16 बच्चों का बाद में किया जाएगा। उन्होंने बताया कि हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन।
थैलेसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। इससे लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। बार-बार रक्त चढ़ाने से मरीज के शरीर में जमा होने वाले लौह तत्व से हृदय, यकृत और फेफड़ों के लिए घातक हो जाता है। यही वजह है कि बोनमैरो प्रत्यारोपण को उपयुक्त माना गया है।
चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन
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यह एक अनुवांशिक बीमारी है। बोनमैरो प्रत्यारोपण के जरिए इसका उपचार किया जा सकता है। इसके लिए बीमार बच्चे के बोनमैरो से उसके भाई या बहन का बोनमैरो का मिलान किया जाता है। मिलान होने के बाद बोनमैरो प्रत्यारोपण किया जाता है।
इस रोग के होने पर शरीर में हीमोग्लोबिन बनना बंद हो जाता है। यदि बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थैलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया हो सकता है। यदि मां या पिता किसी एक में माइनर थैलेसीमिया है तो बच्चे में 25 प्रतिशत संभावना है। ब्लड की जांच में कंपलीट ब्लड काउंट (सीबीसी), हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस, म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) द्वारा भी इसकी जांच होती है।
कैसे करें पहचान
इसकी पहचान बच्चे के तीन माह होने पर दिखने लगती है। रक्त की कमी होने से बच्चा बीमार रहने लगता है और उसे बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। मरीज का चेहरा सूखने लगता है। वह लगातार बीमार रहने लगता है। वजन घटने लगता है।
इस तरह बचें
यदि परिवार में किसी को थैलेसीमिया रहा है तो शादी से पहले महिला व पुरुष के ब्लड की जांच करा लें।
- गर्भ धारण करने के तीन माह का वक्त पूरा होने से भ्रूण की जांच करा लें।
- यदि एक बच्चे में थैलेसीमिया है तो माता-पिता दोनों जांच कराने के बाद दूसरे बच्चे के गर्भ में आते ही जांच कराएं। चिकित्सक की निगरानी में हर तीसरे माह जांच कराते रहें।