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शिक्षकों के प्रमोशन में अब रिसर्च बाधा नहीं

Thu, 13 Mar 2014 12:02 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, लखनऊ
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अब विश्वविद्यालय व डिग्री कॉलेजों में पढ़ाने वाले एसोसिएट प्रोफे सर को कॅरिअर एडवांसमेंट स्कीम के तहत प्रमोशन में रिसर्च व प्रोजेक्ट की वजह से परेशान नहीं होना पड़ेगा।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने बीते दिनों हुई 497 वीं बैठक में अपने रेग्युलेशन में बदलाव करते हुए रिसर्च व प्रोजेक्ट वर्क को वैकल्पिक बना दिया है।

डिग्री कॉलेजों में प्रोफेसर का पद नहीं होता, वहां असिस्टेंट व एसोसिएट प्रोफेसर ही होते हैं, इसलिए यह बदलाव एसोसिएट प्रोफेसरों के प्रमोशन के लिए किया है।

लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध डिग्री कॉलेजों में जहां पर शिक्षकों को अभी तक शोध पर्यवेक्षक बनाने की छूट नहीं मिली है।

यही नहीं शिक्षकों को रिसर्च प्रोजेक्ट भी इस कारण कम ही मिलते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। इसके नंबर वैकल्पिक होने के कारण अब टीचर सेमिनार, संगोष्ठी आदि में अधिक नंबर पाकर इस खाई को पाट सकेंगे।
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लुआक्टा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मौलींदु मिश्रा कहते हैं कि बीते कई वर्षों से डिग्री शिक्षक लखनऊ विश्वविद्यालय से मांग कर रहे थे कि उन्हें रिसर्च गाइड बनाने की सुविधा दी जाए।

बाकी सभी यूनिवर्सिटी संबद्ध डिग्री कॉलेजों को रिसर्च गाइड बनने की सुविधा देती हैं लेकिन यहां यह मांग पूरी नहीं हो पा रही।

यूजीसी ने जून 2013 में अपने रेग्युलेशन में अकादमिक निष्पादन सूचक (एपीआई) में रिसर्च व प्रोजेक्ट के अंक प्रतिशत भी निर्धारित किए थे।

शोध परियोजना के 20 प्रतिशत अंक और शोध मार्गदर्शन के 10 प्रतिशत अंक थे। कॅरिअर एडवांसमेंट स्कीम के तहत एलयू से संबद्ध डिग्री शिक्षकों को प्रोन्नति पाने के लिए मुसीबत का सामना करना पड़ रहा था।

ऐसे में शिक्षकों को यह 30 अंक हासिल करने में दिक्कत होती थी। अब उन्हें यह परेशानी नहीं होगी।

इसी के साथ प्रदेश भर में डिग्री कॉलेज के शिक्षकों को शोध पर्यवेक्षक व शोध परियोजना की सुविधा न मिलने पर भी प्रोन्नति में दिक्कत नहीं होगी। फिलहाल, इससे बड़ी संख्या में शिक्षक लाभन्वित होंगे।

प्रोजेक्ट के 30 अंक वैकल्पिक
यूजीसी ने अपने रेग्युलेशन में जो बदलाव किया है, उसमें शोध परियोजना व मार्गदर्शन के अंक एसोसिएट प्रोफेसर के लिए वैकल्पिक कर दिया है।

ऐसे में अब विवि व कॉलेजों में पढ़ाने वाले एसोसिएट प्रोफेसरों को इन 30 अंकों को अपने शोध प्रपत्र, शोध प्रकाशन, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम व सम्मेलन और संगोष्ठी के माध्यम से अर्जित करने की छूट मिल जाएगी।

इसका सबसे बड़ा फायदा डिग्री शिक्षकों को मिलेगा। विश्वविद्यालय में तो शोध पर्यवेक्षक एसोसिएट प्रोफेसर बनते हैं और उन्हें शोध परियोजना भी मिलती है।

15 साल के अनुभव पर ही बनेंगे प्राचार्य
यूपी विश्वविद्यालय के ऑर्डिनेंस में बदलाव होने के बाद अब ऐसे शिक्षक जिन्हें कम से कम 15वर्ष का अनुभव होगा, वही प्राचार्य बन पाएंगे। लखनऊ विश्वविद्यालय इस बदलाव को अब लागू करने जा रहा है।

सभी डिग्री कॉलेजों में प्राचार्य बनने के लिए अभी तक 10 वर्ष का अनुभव जरूरी होता था लेकिन अब इसे बढ़ाकर 15 वर्ष कर दिया जाएगा। इसके बाद शिक्षकों को प्राचार्य बनने के लिए इंतजार करना होगा।

शिया पीजी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एमएस नकवी कहते हैं कि इस बदलाव से प्राचार्य वही बन पाएगा जो कि ज्यादा अनुभव रखता हो। यह अच्छी बात है इसमें कोई बुराई नहीं।

आखिर प्राचार्य बनने के लिए अधिक अनुभव जरूरी है। इधर लुआक्टा के अध्यक्ष डॉ. मौलींदु मिश्रा इसका विरोध करते हैं, वे कहते हैं कि इससे एक शिक्षक को प्राचार्य बनने में अब पांच साल और इंतजार करना पड़ेगा।
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