30 फीसदी युवाओं ने माना कि वर्क फ्रॉम होम के चलते वे अपने कार्य क्षेत्र से अलगाव महसूस कर रहे हैं। उनके अनुसार नौकरी में होते हुए भी उन्हें ऐसा महसूस होता है कि मानो उनकी प्रासंगिकता ही समाप्त हो गई हो।
भविष्य की चिंता भी
दोबारा नौकरी न मिलने का डर, संक्रमित होने की दहशत 40 फीसदी युवाओं ने माना कि ऑफिस, कॉलेज और सार्वजनिक स्थलों में संक्रमित होने का भय उन्हें तनावग्रस्त कर रहा है। साथ ही 60 प्रतिशत युवा दोबारा नौकरी न मिलने, सामाजिक दूरी बनाए रखने, और सामाजिक समारोहों में शामिल न हो पाने की परेशान हैं।
सुखद संकेत : जागरूकता भी बढ़ी
84 फीसदी युवा बोले- करते रहेंगे गाइडलाइन का पालन
इतनी निराशा के बीच यह एक सकारात्मक संकेत है कि 84 फीसदी युवा मानते हैं कि वे भविष्य में भी सैनिटाइजर व मास्क का इस्तेमाल करते रहेंगे और सामाजिक दूरी बनाए रखेंगे। वे बाहर के खाने से परहेज करेंगे। कुछ वर्षों में वैश्वीकरण के चलते शहरों में विभिन्न रेस्टोरेंट और फूड कॉर्नर में काफी इजाफा हुआ है।
डॉ. सुप्रिया सिंह कहती हैं कि 40 फीसदी युवाओं ने माना कि उन्हें क्वारंटीन सेंटर में ड्यूटी करने, अस्पताल जाने या घर के किसी सदस्य के बाहर से आने के कारण दूसरे लोगों की उपेक्षा, बुरे बर्ताव और दूरी का सामना करना पड़ा है। जुखाम, खांसी या छींक आने पर वे कोशिश करते हैं कि अन्य लोगों को इसका पता न चल सके।
एक अलग तरह के भेदभाव की शुरुआत
डॉ. अमिष सिंह कहते हैं कि 23 फीसदी युवाओं का मानना है कि बाहर से आने वाले श्रमिक, छात्र और अन्य लोग इस बीमारी को फैलाने का प्रमुख कारण हैं। 50 फीसदी युवा मानते हैं कि उन्हें घरों में क्वारंटीन करने की अपेक्षा गांव या संभव हो तो गांव के बाहर के स्कूलों में रखा जाना चाहिए। 26 फीसदी ने कहा कि उन्हें जिले में प्रवेश ही नहीं देना चाहिए।
- 60 फीसदी लोगों ने माना कि उन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपने संबंधी/दोस्तों और पड़ोसियों को घर आने से मना किया।
- 77 फीसदी ने कहा कि वे पड़ोसियों से जिन खाद्य पदार्थों एवं वस्तुओं का सहजता से आदान-प्रदान करते थे। अब उनसे बचते हैं। पड़ोसियों से मनमुटाव और दूरियां बढ़ गई हैं।
- 80 फीसदी ने कहा कि फलों व सब्जियों की खरीदारी वे गली-मोहल्लों के जानकार विक्रेता से ही करते हैं।
- 50 फीसदी युवाओं ने माना कि हर वक्त घर में रहने के कारण वे मन मुताबिक जीवन नहीं जी पा रहे हैं।