भले ही सूबे में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ढेरों योजनाओं के क्रियान्वयन के दावे होते हैं, लेकिन हकीकत इससे काफी जुदा है। हालत इस कदर खराब है कि सूबे की राजधानी तक पढ़ाई के मामले में बेहद पिछड़ा हुआ है।
बात स्कूल में नामांकन की हो या फिर गुणवत्ता की, हर मामले में लखनऊ का नाम नीचे से तीसरी पायदान पर आता है। इतना ही नहीं राजधानी में सरकारी स्कूल के आठवीं के 78.1 फीसदी बच्चे साधारण भाग के सवाल नहीं लगा पाते हैं।
सरकारी तंत्र आंकड़ों की बाजीगरी में यह तथ्य भले ही छिपा ले, लेकिन सरकारी प्राथमिक स्कूलों की गुणवत्ता पर सर्वे करने वाली संस्था एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) में इसका खुलासा हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में अभी भी 8.2 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। नामांकन के मामले में इससे खराब स्थिति केवल बरेली और मुरादाबाद की ही है। बरेली में 12.2 फीसदी और मुरादाबाद में 8.8 फीसदी बच्चे आज भी स्कूल का मुंह नहीं देख पाते हैं।
पढ़ाई की गुणवत्ता के मामले भी लखनऊ का नंबर सबसे खराब रिपोर्ट कार्ड वाले जनपदों की सूची में तीसरे नंबर पर ही आता है। असर की वर्ष 2016 रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों के नामांकन में सुधार हुआ है, लेकिन उत्तर प्रदेश की स्थिति पहले से खराब हुई है। प्रदेश में अभी भी 5.3 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं।