इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने दीवानी दावा दायर करने वाले एक वकील को धमकी देकर मारपीट करने के आरोप के मामले में जिला जज लखनऊ से सीलबंद रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने डीसीपी पश्चिमी को निर्देश दिया है कि इस घटना में शामिल लोगों की पहचान करें। इसके लिए कोर्ट में उन्हें सीसीटीवी फुटेज व याचिका के कथन की मदद लेने की छूट दी है। अदालत ने जिला जज समेत लखनऊ बार एसोसिएशन व सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्षों को निर्देश दिया है कि आरोपियों की पहचान करने में डीसीपी पश्चिमी की पूरी मदद करें। साथ ही डीसीपी से घटना की विस्तृत रिपोर्ट 13 दिसंबर को तलब की है।
न्यायमूर्ति राकेश श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता चंद्र शेखर यादव की याचिका पर दिया है। याची का कहना था उसने सिविल कोर्ट में एक दावा दायर किया था। इसमें प्रतिवादी की तरफ से दो वकीलों ने बगैर पता दिए व बिना मोबाइल नंबर के वकालतनामा दाखिल किया। साथ ही याची को दावे में पैरवी करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। याची का यह भी आरोप है कि गत 1 नवंबर को इन्हीं दोनों वकीलों ने 50-60 अज्ञात लोगों के साथ आकर याची के साथ के वकीलों व उसके साथ एक मुंशी को सिविल जज एफटीसी सीनियर डिवीजन लखनऊ की अदालत में जाने से रोका व हाथापाई की।
याची ने इस घटना की प्राथमिकी वजीरगंज थाने में दर्ज कराई थी। याची ने याचिका में घटना की जांच समेत जिला कोर्ट परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने की गुजारिश की है। याची का कहना था कि एक माह बाद भी इस मामले ती तफ्तीश शुरू नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि अपने तरह का यह पहला केस नहीं है बल्कि एक और मामला हिंसा व वकीलों के गैर व्यावसयिक आचरण से संबंधित है। ऐसे मामलों में विवेचना न होना स्वीकार्य नहीं है। हिंसा संबंधी शिकायतों व न्याय देने में बाधा की घटनाओं की समुचित व समय से विवेचना कर जल्द गौर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के समय गत 30 नवंबर को दूसरे केस में पेश हुए डीसीपी पश्चिम जोन समेत वजीरगंज थाने के एसएचओ व विवेचक को फिर 13 दिसंबर को अगली सुनवाई पर तलब किया है।