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Lucknow News: अध्ययन से तय होगा गर्भाशयकालीन मधुमेह की जांच के लिए सटीक तरीका

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प्रतीकात्मक।
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लखनऊ। गर्भवतियों में मधुमेह की सही पहचान और सुरक्षित मातृत्व के लिए व्यापक राष्ट्रीय अध्ययन शुरू किया गया है। इसमें केजीएमयू समेत देश के सात प्रमुख मेडिकल संस्थान शामिल हैं। अध्ययन के लिए 24 से 28 सप्ताह की 16,000 से अधिक गर्भवतियों को शामिल करने का लक्ष्य है।
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केजीएमयू के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग (क्वीन मेरी अस्पताल) की अध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल ने बताया कि गर्भाशयकालीन मधुमेह गर्भवतियों और नवजात शिशुओं के लिए बड़ी चुनौती है। सही समय पर पता न चलने से दोनों में गंभीर खतरा बढ़ जाता है। जांच के तरीकों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। इस अनिश्चितता को दूर करने के लिए डिसाइड (डायग्नोस्टिक इवैल्यूएशन एंड कंपैरिजन ऑफ आईएडीपीएसजी एंड डिपसी क्राइटेरिया फॉर एक्सपेक्टेंट मदर्स) नामक अध्ययन शुरू किया गया है। इसका नेतृत्व एम्स नई दिल्ली के डॉक्टर कर रहे हैं।
इसमें मधुमेह की जांच के दो तरीकों डीआईपीएसआई और आईएडीपीएसजी की तुलना की जा रही है। डीआईपीएसआई में बिना उपवास ग्लूकोज देकर दो घंटे बाद रक्त शर्करा मापा जाता है। आईएडीपीएसजी में खाली पेट और फिर एक व दो घंटे बाद रक्त शर्करा जांचा जाता है।
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यह अध्ययन तय करेगा कि आईएडीपीएसजी जैसे जटिल और महंगे टेस्ट को देश में लागू करना कितना फायदेमंद है। शुरुआती चरण में शुगर की सटीक पहचान से बच्चे में अत्यधिक वजन का खतरा कम होता है। इससे प्रसव में जटिलताएं और बच्चे में भविष्य में डायबिटीज का जोखिम भी कम किया जा सकेगा। यह रिसर्च कम संसाधनों वाले भारतीय स्वास्थ्य ढांचे के लिए आर्थिक और नैदानिक रूप से सबसे उपयुक्त तरीका स्पष्ट करेगी।
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