मिशन शक्ति अभियान के तहत कुड़ियाघाट पर आयोजित शक्तिगाथा कार्यक्रम में किस्सागोई करते हिमांशु ब?
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लखनऊ। मनु उस वक्त 13 साल की थी। नाना साहब और मनु घोड़े पर निकले हुए थे। मनु ने घोड़े को ऐड़ लगाई और नाना से आगे निकल गई। पीछे से आवाज आई- ‘मनु मैं मरा’। सुनते ही मनु रुक गई। नाना घोड़े से गिर गए थे और खून से लथपथ हो गए थे। मनु ने बेबाकी व बेफिक्री से कहा- ‘घबराओ मत नाना, खून से मत डरो’ और नाना को अपने घोड़े पर लेकर इलाज के लिए पहुंच गईं। मनु, जिन्हें हम झांसी की रानी के नाम से जानते हैं। शौर्य व पराक्रम की प्रतिमूर्ति थीं। मनु के बहाने महिलाओं के जुझारूपन, हिम्मत और देशप्रेम से किस्सागो हिमांशु बाजपेई व प्रज्ञा शर्मा ने श्रोताओं को रविवार को रूबरू कराया। वे यूपी पुलिस के मिशन शक्ति के तहत कुड़ियाघाट पर ‘शक्तिगाथा: किस्सा झांसी की रानी का’ वर्णन शीरीन अल्फाजों में कर रहे थे, जहां पुलिस कमिश्नर सहित आला अधिकारी भी उपस्थित रहे। हिमांशु व प्रज्ञा की जोड़ी ने झांसी की रानी की कहानी को यादगार बनाया। दर्शकों को बांधे रखा और ढलती शाम के साथ-साथ रानी लक्ष्मीबाई के एक-एक किस्से ने दर्शकों में देशप्रेम भर दिया। हिमांशु ने बताया कि रानी लक्ष्मीबाई ही क्यों, उनकी सहेलियां व दासियां भी शौर्य की प्रतिमूर्ति थीं। रानी का विवाह राजा गंगाधर राव से हुआ। वह झांसी पहुंची। एक बार राजा ने उनसे पूछा कि क्या वे नाटक देखने चलेंगी, इस पर रानी ने कहा कि बिलकुल चलूंगी, स्वराज जो आ चुका है। राजा व्यंग्य को समझ गए। उन्होंने कहा कि घुड़सवारी, मलखम, कुश्ती के अतिरिक्त भी कुछ पसंद है आपको।
56 के जनरल को 23 की रानी ने दी टक्कर
हिमांशु व प्रज्ञा ने बताया कि राजा गंगाधर राव का निधन बेऔलाद ही हो गया। 1857 में अंग्रेज जनरल ह्यू रोज ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। वह 56 साल का था और रानी उस वक्त महज 26 वर्ष की थी। ह्यू रोज ने रात के वक्त हमला किया। पर, रानी ने पहले ही रणनीति बना रखी थी। वह दिन में पुरुष सैनिकों की ड्यूटी लगाती थीं और रात में किले का मोर्चा महिलाएं संभालती थीं। ह्यू रोज ने देखा कि औरतें तोप चला रही हैं तो वह घबरा गया। उधर, तात्या रानी की मदद के लिए निकले, पर अंग्रेजों ने उन्हें रास्ते में ही हरा दिया और वह वापस लौट गए।
झलकारी बन गईं लक्ष्मीबाई, अंग्रेजों को छकाया
किस्सागोई करते हुए हिमांशु ने बताया कि अंग्रेजों ने घनघोर युद्ध के दौरान रानी ने अपने पुत्र को पीठ पर चादर से बांधा और भांडेरी गेट से निकलने लगीं। इसी बीच उनकी महिला सिपाही झलकारी ने रानी लक्ष्मीबाई का भेष बनाया और दुश्मनों पर टूट पड़ीं। इधर वह अंग्रेजों को छका रही थी, दूसरी ओर रानी लक्ष्मी बाई काल्पी के रास्ते पर थीं। झलकारी के शौर्य ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। झलकारी की तरह सुंदरी, मुंदरी, काशी और ऐसी ही कई महिलाएं रानी के साथ थीं, जिनके नमन में इतिहास भी झुकता है।