राजनीतिक जगत के ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक संसार के भी महत्वपूर्ण व्यक्ति थे राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन। बचपन से ही सत्संग के प्रति उनका विशेष लगाव था। सूफी साहित्य का भी उन्होंने गहरा अध्ययन किया था। देवरहा बाबा ने उन्हें ‘राजर्षि’ की उपाधि प्रदान की थी। वैसे तो राजनीति में छल-कपट सब मान्य है, पर वह कहते थे राजनीति में सत्य का बड़ा महत्व है।
शायद यही वजह रही कि राजनीति में वह जहां रहे वहां सत्य की स्थापना का ही प्रयास किया और अपने को इस दुनिया की गंदगी और कीचड़ से अलग रखा। डॉ. अगम प्रसाद माथुर ने संस्मरण में लिखा है, ‘राजर्षि टंडन सिनेमाघरों में प्रदर्शित अश्लील फिल्मों और अर्धनग्न चित्रों के प्रकाशन के घोर विरोधी थे।