बाबू जी ने पत्नी से कहा, ‘बउआ ये इत्र की शीशियां मेरी नहीं कांग्रेस के अध्यक्ष की हैं। इसलिए वे शीशियां मुझे दो ताकि जमा करा दें।’ हम लोगों ने समझाया, ‘बाबू जी! खरीदना तो पड़ेगा ही। इसलिए क्यों जिद कर रहे हैं। फिर ये कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे कांग्रेस के कोष में जमा किया जा सके।’
बाबू जी ने कुछ देर सोचा फिर बोले, ‘किसी इत्र वाले को बुलवाओ।’ इत्र वाला बुलाया गया। बाबू जी ने उनकी कीमत लगवाई। जितनी कीमत लगी उससे दस रुपये अधिक कांग्रेस के कोष में जमा कराया, तब इन्हें रखा।’