अशफाक बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज थे। उन्होंने राजा-महाराजाओं के बीच लड़ाई की कहानियां खूब पढ़ीं। हमेशा ऐसी कल्पनाओं में डूबे रहते कि अन्याय करने वालों को कैसे मुंहतोड़ सबक सिखाया जाए। इन कहानियों को पढ़ने के बाद विद्यार्थी जीवन से ही अशफाक उल्ला खां के दिल और दिमाग में अंग्रेजों के खिलाफ काफी आक्रोश भर गया।
वह मानने लगे थे कि देश की सारी समस्याओं की जड़ अंग्रेजों की हुकूमत है। अगर अंग्रेजी हुकूमत को खत्म कर दिया जाए तो देश को समस्याओं से भी मुक्त किया जा सकता है। सुधीर विद्यार्थी ने संस्मरण में लिखा है, ‘अशफाक उल्ला स्कूल में थे। तभी यह खबर आई कि दिल्ली में वायसराय पर किसी ने बम फेंक दिया है।
स्कूल बंद कर दिया गया। जब स्कूल बंद करने की घोषणा हुई तो अशफाक को काफी खुशी महसूस हुई। वह सोचने लगे कि देश को आजाद कराने का तरीका सशस्त्र क्रांति ही है। अंग्रेजों को इसी से डराया जा सकता है। वे घटना के बारे में जितना सोचते उनके मन में क्रांतिकारी बनकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प दृढ़ होता जा रहा था। उन्हें लगा कि वह हाथ में तलवार लेकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे हैं।