संकरी पगडंडियों से होकर रहगुजर उसके घर तक जाती है। छप्पर वाली झोपड़ी...चारों तरफ खेत-खलिहान के बीच पसरा सन्नाटा मानो पांच माह पहले यहां गूंजी ‘बेबस चीत्कार’ की कहानी कह रहा था।
साथ में गईं सब इंस्पेक्टर उसे उसके नाम से पुकारती हैं तो बिखरे बाल, हाथों में लगी घर लीपने की मिट्टी, कंधे पर शॉल डाले नीले कुर्ते और काली सलवार में एक 15 साल की लड़की बाहर आती है।
खाकी वर्दी वाली दीदी के साथ आए अनजाने लोगों को देखकर रज्जो (काल्पनिक नाम) की आंखों में एक संकोच उभरता है, फिर उसमें हरकत होती है और हमारे लिए पेड़ की छांव तले कुर्सियां डालकर वह भी सामने बैठ जाती है।
बिना कहे वह मानो सब समझ जाती है और कहती है कि आप क्या पढ़ाई में मेरी मदद करेंगे? दीदी, क्या आप एक मिनट रुकेंगी जरा? मैं अपनी डायरी लेकर आती हूं। दो मिनट बाद... खामोशी टूटती है और आंखों में नमी लिए डायरी में लिखे ये शब्द फूट पड़ते हैं
देख ये हौसला मेरा, मेरे बुजदिल दुश्मन
तुम को लश्कर में पुकारा तन-ए-तन्हा होकर।
'तीनों को सजा दिलाए बिना चैन नहीं लूंगी'
हम कुछ कहते हैं, वह बिना रुके बोलती है। होठ तब-तब रुकते जब उसके पिता हाथों में डंडा लिए हमारे चारों तरफ घूम रहे कुत्ते के पिल्लों को भगाने के बहाने उसे घूरते...मानो उसे कुछ न बोलने, खामोश रहने की हिदायत दे रहे हों।
वह कहती है, ‘जब मैंने 11वीं कक्षा में प्रवेश किया तो उस समय हमारे यहां एक कल्चरल इवेंट का आयोजन हुआ था। वहीं पर ये पंक्तियां एक टीचर ने सुनाई थीं।
....अक्तूबर की शाम चार बजे से अगले एक सप्ताह तक शारीरिक और मानसिक तौर पर खुद को संभालने के बाद मैंने तय कर लिया था कि मुझे रिवेंज चाहिए। जब तक मैं तीनों को सजा नहीं दिलवा देती, तब तक चैन नहीं लूंगी।
'उठी तो मेरे लिए सबकुछ खत्म था'
कोचिंग जाते समय पीछे से कुछ लोगों ने मुझे कार में खींच लिया। मैं चिल्लाती, इससे पहले मेरा मुंह कस कर बंद कर दिया गया। वे तीन थे।
मुझे कहीं दूर एक सूनसान इलाके में बने एक कमरे में ले गए जहां पहुंचते ही मुझे चक्कर सा आया और उसके बाद मालूम नहीं। जब उठी तो मेरे लिए सबकुछ खत्म हो चुका था।
मैं ढूंढते-ढूंढते किसी तरह पीसीओ तक पहुंची। पापा शराब पीकर धुत पड़े होंगे, भाई लखनऊ में होगा... यह सोचकर मैंने कोचिंग के परिचित एक लड़के को फोन कर सबकुछ बताया और बुलाया।
उसने किसी तरह मुझे घर तक छोड़ा। मेरे भाई ने मुझे हिम्मत दी और कहा- नहीं, तुम्हारा दोष नहीं। तुम क्यों लज्जित होगी, हम लड़ेंगे और दोषियों को सजा दिलाएंगे। हालांकि पापा ने मुझे घर में पड़े रहने को कहा।
तकलीफ देता है उस काली रात का सच
मैंने आत्महत्या करने का मन बनाया, लेकिन बबीता मैडम (सीओ कैंट), संगीता मैडम (कंसल्टेंट, पहल) और सुमन दीदी (एसआई) ने मेरा हौसला बढ़ाया। कोचिंग तो मेरी बंद कर दी गई, लेकिन किसी तरह स्कूल जाने की इजाजत मिल गई।
(बात निकली तो रुकी नहीं। उसकी आंखें जरूर गीली हुईं लेकिन आंसू गिरने से पहले उन्हें पीते हुए कहने लगी)
स्कूल में पढ़ते-पढ़ते अचानक जब पेट में दर्द उठता है तो शरीर के इस दर्द से ज्यादा उस काली रात का सच तकलीफ देता है। कुछ पल के लिए तो कुछ भी समझ नहीं आता। फिर बहन के साथ क्लीनिक जाती हूं, दवा लेती हूं।
दवा से पेट का दर्द तो ठीक हो जाता है पर उस काली रात का जख्म और गहरा हो जाता है। इतना ही नहीं दीदी....ये पुलिस वाले बार-बार आकर बयान के नाम पर सिर्फ एक ही बात पूछते हैं।
क्या हुआ था, कैसे हुआ और कितने लोग थे, कौन आगे बैठा था...। अब मैंने तय कर लिया है कि बयान जो देना था, दे चुकी हूं। अब नहीं दूंगी, पहले दोषियों को गिरफ्तार करो।
वह ऐसे घूरता है जैसे खा जाएगा
तीन दोषी हैं, लेकिन पकड़े गए सिर्फ दो गए। एक बड़ी पहुंचवाला है, इसलिए उसे किसी ने नहीं पकड़ा और पुलिस भी चाहती है कि मैं उसे पहचानने से इन्कार कर दूं।
जबकि वह तो आजाद घूम रहा है और मुझे ऐसे घूरता है, जैसे खा जाएगा। पिता ने घर से ही निकाल दिया था...हम आठ बहनें और एक भाई हैं। छह बहनों की शादी हो चुकी है।
मां है नहीं, पापा हैं लेकिन पीने के बाद वह सबकुछ भूल चुके होते हैं। इस घटना के बाद उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया था, और जब घर में घुसने की इजाजत मिली तो मेरी शादी करना चाहते हैं।
क्यों सहूं, सजा दिलवाऊंगी मैं...
मुझे मैथ्स विषय बहुत पसंद है और मैं आईएएस अफसर बनना चाहती हूं और मैं बनूंगी।
मुझे मालूम है कि अपने सपने को पाने के लिए मुझे गरीबी से लड़ना होगा, संघर्ष करना होगा, मैं करूंगी। आखिर मैं क्यों सहूं, उन्हें सजा दिलाने की कोशिश जारी है और दिलवाऊंगी भी।
इस मासूम रज्जो की कहानी शर्मनाक कृत्य से लेकर साहस की अनूठी दास्तां सुनाती है। दर्द होता है, पर ये भी इस अच्छे-बुरे समाज में जीने की सीख दे जाती है।