जिंदगी ने उसे ऐसा जख्म दिया है, जो हर रोज आईना देखने के साथ ताजा हो जाता है। यह जख्म है तेजाब का। जख्म, जो ताउम्र उसके साथ रहने वाला है।
एसिड अटैक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद एक बार फिर इसे लेकर पूरे देश में चर्चा हो रही है। ऐसे में हमने शहर की एक ऐसी महिला से मुलाकात की, जिसे उसी के पति ने तेजाब से नहला दिया था।
तेजाब से 75 परसेंट जल चुकीं मीना सोनी एक एनजीओ में बतौर को-ऑर्डिनेटर काम कर रही हैं और अपनी बेटियों को खुद से ज्यादा हिम्मती बनने की शिक्षा दे रही हैं।
कोर्ट के फैसले पर वे सवाल उठाती हैं, ‘बहुत अच्छी पहल है, लेकिन उनका क्या जो मेरी तरह वर्षों पहले इसका शिकार हुईं?’
अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश क्या इतनी बड़ी गलती हो सकती है कि किसी के चेहरे की असली पहचान ही छीन ली जाए...?
लेकिन, मीना को इसी कुसूर की सजा मिली। उसने गोसाईंगंज से हाईस्कूल तक पढ़ाई की ही थी कि 16 साल की उम्र में ब्याह कर बांदा भेज दिया गया।
सुनारी का काम करने वाले पति ने एक साल बाद काम छोड़ दिया और चार साल में मीना दो बेटियों की मां बन गई। उसने बेटियों की परवरिश के लिए काम करने की सोची।
एनजीओ से जुड़ने से हुआ विरोध
इस पर ससुराल वालों ने पति के साथ उसे घर से निकाल दिया। वो अलग रहते हुए महिलाओं के लिए काम करने वाले एक एनजीओ से जुड़ गई।
इस पर पति ने भी विरोध शुरू कर दिया। इसके बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी और छोटी बेटी के साथ घर से निकल गई। काम करके खुद को और बेटी को पालने लगी।
इसी बीच, मीना को तीसरा बेटा हुआ और पति उसके साथ रहने लगा। मीना ने एक अखबार में नौकरी कर ली। यहीं से फिर जुल्म का दौर शुरू हो गया।
बांदा में जून 2004 की दोपहर हुई घटना को याद कर मीना आज भी सहम जाती हैं। वे कहती हैं कि उस दिन मुझे बुखार था। मैं दवा खाकर लेटी थी।
लगा कि चेहरे पर आग लग गई
अचानक लगा कि मेरे चेहरे पर किसी ने आग लगा दी। मैं बस भागी। उसने मुझे पकड़ना चाहा। उसकी पकड़ से बचने के लिए मेरी साड़ी भी खिंच गई। मैं वैसे ही अस्पताल की ओर भागी। दो घंटे बाद मेरे पति ने भी आत्महत्या कर ली, लेकिन मैं रोई नहीं, क्योंकि उसने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी थी।
मेरा चेहरा-हाथ बुरी तरह से झुलस चुके थे और एक-दूसरे से जुड़ गए थे। कई महिला संगठनों ने सहायता की और 2006 में सर्जरी हुई।
और शुरू की नई जिंदगी
इसके बाद मीना लखनऊ आई और एक नई जिंदगी शुरू की। आज मीना अपनी जैसी महिलाओं के लिए एक मिसाल बन गई हैं। वे सनतकदा सामाजिक पहल में जेल को-ऑर्डिनेटर का काम देख रही हैं। एक बेटी आईटी कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रही है, जबकि एक बेटी और एक बेटा कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं।
मीना कहती हैं कि मैं लकी थी जो बच गई। मुझे तो भगवान ने बहुत सुंदर बनाकर भेजा था, लेकिन समाज ने मुझे ये चेहरा दिया है, इसलिए मैं समाज को नहीं मानती।
यह वही समाज है, जब मैं अस्त-व्यस्त अवस्था में भाग रही थी तो किसी ने मदद नहीं की थी। अब मैं अपनी बेटियों को खुद से ज्यादा हिम्मती बना रही हूं।
आत्मनिर्भर बनने के बाद करूंगी शादी
भले ही वे तीस साल की हो जाएं, समाज कुछ भी कहता रहे, लेकिन उनकी शादी तभी करूंगी जब अपने पैरों पर खड़ी हो जाएंगी।
मैं अपनी बात नहीं करती, क्योंकि मैं काम कर रही हूं, लेकिन तेजाब हमले की शिकार कई ऐसी महिलाएं हैं, जो न अपना इलाज करा पाईं और न ही काम करने की स्थिति में हैं।
वे आज भी उस दंश को झेल रही हैं। उन महिलाओं के लिए भी कुछ होना चाहिए।