एक कप्तान साहब हैं जिनकी जिले से हटाए जाने की पीड़ा मिटाए नहीं मिट रही।
सियासी रिश्तों को निभाने के नतीजे पर जब काफी मशक्कत के बाद इन अधिकारी को एक महत्वपूर्ण जिले की कमान सौंपी गई तब उनके साथियों ने उनकी पहुंच को माना था।
साहब ने ऊपर तक के अपने मजबूत रिश्तों का हवाला देते हुए अपने कुछ और साथियों को भी एडजस्ट कराने का दावा तक कर दिया था, लेकिन आयोग का क्या करें।
उस पर कोई सियासी रंग चढ़ता ही नहीं। पिछले दिनों चुनाव आयोग के आदेश पर कई अधिकारियों को अपनी मनचाही पोस्टिंग से हटना पड़ा।
जिले से हटकर डीजीपी मुख्यालय का चक्कर लगा रहे कप्तान साहब से जब कुछ अधिकारियों ने बात की तो उनकी पीड़ा छलक ही आई। बोले, अच्छा है चुनाव के दौरान पुलिस का झंडा लगाकर दिनभर बावर्दी दुरुस्त दौड़ते रहते।
चुनाव तक अब इस सबसे छुटकारा मिला। सोच रहे हैं कि अब पार्टी कार्यालय जाकर एक झंडा खरीद लाएं और अपनी कार में लगाकर घूमें।
अपनी झेंप मिटाते हुए वह फिर बोले कि आखिरकार आयोग ने पार्टी का नजदीकी मानते हुए ही तो हटाया है तो अब पार्टी का झंडा लगाने में कौन सी दिक्कत आ रही है।